गीता अध्याय 16 : 1-10

अभयम्, सत्त्वसंशुद्धिः, ज्ञानयोगव्यवस्थितिः,
दानम्, दमः, च, यज्ञः, च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम्।।1।।
निर्भय अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता ज्ञानी और दान संयम यज्ञ करने से धार्मिक शास्त्रों पठन पाठन भक्ति मार्ग में कष्ट सहना रूपी तप और आधीनता।

अहिंसा, सत्यम्, अक्रोधः, त्यागः, शान्तिः, अपैशुनम्,
दया, भूतेषु, अलोलुप्त्वम्, मार्दवम्, =ûीः, अचापलम्।।2।।
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना सत्यवादी अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना परमात्मा के लिए सिर भी सौंप दे अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित की चंचलता का अभाव निन्दादि न करना प्राणियों में दया निर्विकार कोमलता बुरे कर्मों में लज्जा चापलूसी रहित।

तेजः, क्षमा, धृतिः, शौचम्, अद्रोहः, नातिमानिता,
भवन्ति, सम्पदम्, दैवीम्, अभिजातस्य, भारत।।3।।
तेज क्षमा धैर्य शुद्धि निर्वैरी और अपने आप को नहीं पूजवावै हे अर्जुन! भक्ति भाव को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण होते हैं।
विशेष:- श्लोक 4 से 20 तक उन व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन है जो पहले कभी मानव शरीर में थे तब भी शास्त्रा विधि अनुसार साधना नहीं की। फिर अन्य योनियों व नरक आदि में तथा क्षणिक सुख स्वर्ग आदि का भोग कर फिर मानव शरीर में आते हैं तो भी स्वभाववश वैसी ही साधना व विकारों में आरुढ़ रहते हैं।

दम्भः, दर्पः, अभिमानः, च, क्रोधः, पारुष्यम्, एव, च,
अज्ञानम्, च, अभिजातस्य, पार्थ, सम्पदम्, आसुरीम्,।।4।।
हे पार्थ! पााखण्ड घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध कठोरता और अज्ञान वास्तव में ये सब राक्षसी सम्पदा के सहित उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

दैवी, सम्पत्, विमोक्षाय, निबन्धाय, आसुरी, मता,
मा, शुचः, सम्पदम्, दैवीम्, अभिजातः, असि, पाण्डव।।5।।
संत लक्षण मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिये मानी गयी है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर क्योंकि तू भक्तिभाव को लेकर उत्पन्न हुआ है।

द्वौ, भूतसर्गौ, लोके, अस्मिन्, दैवः, आसुरः, एव, च,
दैवः, विस्तरशः, प्रोक्तः, आसुरम्, पार्थ, मे, श्रृणु।।6।।
हे अर्जुन! इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो ही प्रकार की है एक तो संत-स्वभाव वाला और दूसरा राक्षसी-स्वभाव वाला उनमें से संत स्वभाव वालों का विस्तार पूर्वक विवरण पहले कहा गया अब तू राक्षसी-स्वभाव वाले मुझसे सुन।

प्रवृत्तिम्, च, निवृत्तिम्, च, जनाः, न, विदुः, आसुराः,
न, शौचम्, न, अपि, च, आचारः, न, सत्यम्, तेषु, विद्यते।।7।।
आसुर-स्वभाव वाले मनुष्य अर्थात् चाहे वे संत कहलाते हैं, चाहे उनके शिष्य या स्वयं शास्त्रा विधि रहित साधना करने वाले व्यक्ति प्रवृति और निवृति इन दोनांेको भी नहीं जानते इसलिये उनमें न तो अंतर भीतर की शुद्धि है न श्रेष्ठ आचरण है और सच्चाई भी नहीं जानी जाती है।
विशेष:- गीता अध्याय 15 श्लोक 15 तथा अध्याय 9 श्लोक 17 में वेद्यः या वेद्यम् का अर्थ जानना किया है।

असत्यम्, अप्रतिष्ठम्, ते, जगत्, आहुः, अनीश्वरम्,
अपरस्परसम्भूतम्, किम्, अन्यत्, कामहैतुकम्।।8।।
वे आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् अवस्थारहित सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के अपने-आप केवल नर-मादा के संयोग से उत्पन्न है केवल काम अर्थात् सैक्स ही इसका कारण है इसके सिवा और क्या है। ऐसी धारणा वाले प्राणी राक्षस स्वभाव के होते हैं।

एताम्, दृष्टिम्, अवष्टभ्य, नष्टात्मानः, अल्पबुद्धयः,
प्रभवन्ति, उग्रकर्माणः, क्षयाय, जगतः, अहिताः।।9।।
इस अपने दृष्टि कोण से मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके नाशात्मा जिनकी बुद्धि मन्द है वे सबका अपकार करने वाले भयंकर कर्म करने वाले क्रूरकर्मी जगत्के नाश के लिये ही उत्पन्न होते हैं।

कामम्, आश्रित्य, दुष्पूरम्, दम्भमानमदान्विताः,
मोहात्, गृहीत्वा, असद्ग्राहान्, प्रवर्तन्ते, अशुचिव्रताः।।10।।
दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओं का आश्रय लेकर अज्ञान से मिथ्या शास्त्रा विरुद्ध सिद्धान्तों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसारमंे विचरते हैं।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana