गीता अध्याय 13 : 1-10

इदम्, शरीरम्, कौन्तेय, क्षेत्राम्, इति, अभिधीयते,
एतत्, यः, वेत्ति, तम्, प्राहुः, क्षेत्राज्ञः, इति, तद्विदः।।1।।
हे अर्जुन! यह शरीर क्षेत्रा इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है उसे क्षेत्राज्ञ इस नाम से तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।

क्षेत्राज्ञम्, च, अपि, माम्, विद्धि, सर्वक्षेत्रोषु, भारत,
क्षेत्राक्षेत्राज्ञयोः, ज्ञानम्, यत्, तत्, ज्ञानम्, मतम्, मम।।2।।
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में अर्थात् शरीरों में जानने वाला भी मुझे ही जान ओर क्षेत्रा-क्षेत्राज्ञ का जो तत्व से जानना है वह ज्ञान है मेरा मत अर्थात् विचार है।

तत्, क्षेत्राम्, यत्, च, यादृक्, च, यद्विकारि, यतः, च, यत्,
सः, च, यः, यत्प्रभावः, च, तत्, समासेन, मे, श्रृणु।।3।।
वह क्षेत्रा जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है ओर जिस कारण से जो हुआ है तथा वह जो और जिस प्रभाववाला है वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

ऋषिभिः, बहुधा, गीतम्, छन्दोभिः, विविधैः, पृथक्,
ब्रह्मसूत्रापदैः, च, एव, हेतुमद्भिः, विनिश्चितैः।।4।।
ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रा के पदों द्वारा भी कहा गया है।

महाभूतानि, अहंकारः, बुद्धिः, अव्यक्तम्, एव, च,
इन्द्रियाणि, दश, एकम्, च, पॅंच, च, इन्द्रियगोचराः।। 5।।
पाँच महाभूत अंहकार बुद्धि और अप्रत्यक्ष भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।

इच्छा, द्वेषः, सुखम्, दुःखम्, सङ्घातः, चेतना, धृतिः,
एतत्, क्षेत्राम्, समासेन, सविकारम्, उदाहृतम्।।6।।
इच्छा द्वेष सुख दुःख स्थूल देह का पिण्ड चेतना और धृृति इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्रा संक्षेप में कहा गया है।

अमानित्वम्, अदम्भित्वम्, अहिंसा, क्षान्तिः, आर्जवम्,
आचार्योपासनम्, शौचम्, स्थैर्यम्, आत्मविनिग्रहः।।7।।
अभिमानका अभाव दम्भाचरण का अभाव किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना क्षमाभाव सरलता श्रद्धा भक्ति सहित गुरु की सेवा बाहर-भीतर की शुद्धि अन्तःकरण की स्थिरता और आत्मशोध।

इन्द्रियार्थेषु, वैराग्यम्, अनहंकारः, एव, च,
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।8।।
इन्द्रियों के आनन्द के भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव जन्म, मृत्यु,जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।

असक्तिः, अनभिष्वङ्गः, पुत्रादारगृहादिषु,
नित्यम्, च, समचित्तत्वम्, इष्टानिष्टोपपत्तिषु।।9।।
पुत्रा-स्त्राी-घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव ममता का न होना तथा उपास्य देव-इष्ट या अन्य अनउपास्य देव की प्राप्ति या अप्राप्ति में अर्थात् इष्टवादिता को भूलकर सदा ही चित का सम रहना।

मयि, च, अनन्ययोगेन, भक्तिः, अव्यभिचारिणी,
विविक्तदेशसेवित्वम्, अरतिः, जनसंसदि।।10।।
मुझे अनन्य भक्ति के द्वारा केवल एक इष्ट पर आधारित भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विकारी मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana