गीता अध्याय 11 : 1-10

मदनुग्रहाय, परमम्, गुह्यम्, अध्यात्मस×िज्ञतम्,
यत्, त्वया, उक्तम्, वचः, तेन, मोहः, अयम्, विगतः, मम।।1।।
आपने कृप्या करने के लिए शास्त्रों के अनुकूल विचार जो श्रेष्ठ गुप्त अध्यात्मिकविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया।

भवाप्ययौ, हि, भूतानाम्, श्रुतौ, विस्तरशः, मया,
त्वत्तः, कमलपत्राक्ष, माहात्म्यम्, अपि, च, अव्ययम्।।2।।
क्योंकि हे कमलनेत्रा! मैंने आपसे प्राणियों की उत्पति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।

एवम्, एतत्, यथा, आत्थ, त्वम्, आत्मानम्, परमेश्वर,
द्रष्टुम्, इच्छामि, ते, रूपम्, ऐश्वरम्, पुरुषोत्तम।।3।।
हे परमेश्वर!आप अपने को जैसा कहते हैं यह ठीक ऐसा ही है परंतु हे पुरुषोत्तम्! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, याक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ईश्वरीय-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

मन्यसे, यदि, तत्, शक्यम्, मया, द्रष्टुम्, इति, प्रभो,
योगेश्वर, ततः, मे, त्वम्, दर्शय, आत्मानम्, अव्ययम्।।4।।
हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है ऐसा आप मानते हंै तो हे योगेश्वर! आप असली अविनाशी स्वरूप के मुझे दर्शन कराइये।

पश्य, मे, पार्थ, रूपाणि, शतशः, अथ, सहस्त्राशः,
नानाविधानि, दिव्यानि, नानावर्णाकृतीनि, च।।5।।
हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों देख।

पश्य, आदित्यान्, वसून्, रुद्रान्, अश्विनौ, मरुतः, तथा,
बहूनि, अदृष्टपूर्वाणि, पश्य, आश्चर्याणि, भारत।।6।।
हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को आठ वसुओं को एकादश रुद्रों को दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्रणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।

इह, एकस्थम्, जगत्, कृृत्स्न्नम्, पश्य, अद्य, सचराचरम्,
मम, देहे, गुडाकेश, यत्, च, अन्यत्, द्रष्टुम्, इच्छसि।।7।।
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।

न, तु, माम्, शक्यसे, द्रष्टुम्, अनेन, एव, स्वचक्षुषा,
दिव्यम्, ददामि, ते, चक्षुः, पश्य, मे, योगम्, ऐश्वरम्।।8।।
परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।

एवम्, उक्त्वा, ततः, राजन्, महायोगेश्वरः, हरिः,
दर्शयामास, पार्थाय, परमम्, रूपम्, ऐश्वरम्।।9।।
हे राजन्! महायोगेश्वर और भगवान्ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त स्वरूप दिखलाया।

अनेकवक्त्रानयनम्, अनेकाद्भुतदर्शनम्,
अनेकदिव्याभरणम्, दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।10।।
दिव्यमाल्याम्बरधरम्, दिव्यगन्धानुलेपनम्,
सर्वाश्चर्यमयम्, देवम्, अनन्तम्, विश्वतोमुखम्।।11।।
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त अनेक अद्धभुत दर्शनों वाले बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को हाथोंमें उठाये हुए दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गन्धका सारे शरीर में लेप किये हुए सब प्रकार के आश्चयर्कों से युक्त सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप भगवान को अर्जुन ने देखा।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana