गीता अध्याय 09 : 1-10

इदम्, तु, ते, गुह्यतमम्, प्रवक्ष्यामि, अनसूयवे,
ज्ञानम्, विज्ञानसहितम्, यत्, ज्ञात्वा, मोक्ष्यसे, अशुभात्।।1।।
तुझ दोष-दृष्टिरहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान को पुनः भलीभाँति कहूँगा कि जिसको जानकर तू शास्त्राविरूद्ध अशुभ कर्मों से मुक्त हो जाएगा।

राजविद्या, राजगुह्यम्, पवित्राम्, इदम्, उत्तमम्,
प्रत्यक्षावगमम्, धम्र्यम्, सुसुखम्, कर्तुम्,अव्ययम्।।2।।
यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा सब गोपनीयों का राजा अति पवित्रा अति उत्तम प्रत्यक्ष फलवाला शास्त्राअनुकूल धर्मयुक्त साधन करने में सुखदाई और अविनाशी है।

अश्रद्दधानाः, पुरुषाः, धर्मस्य, अस्य, परन्तप,
अप्राप्य, माम्, निवर्तन्ते, मृृत्युसंसारवत्र्मनि।।3।।
हे अर्जुन! श्रद्धारहित मनुष्य इस उपर्युक्त धर्म के भक्ति मार्ग को न प्राप्त होकर मुझ ब्रह्म के मृत्युलोक चक्र में चक्र लगाते रहते हैं।

मया, ततम्, इदम्, सर्वम्, जगत्, अव्यक्तमूर्तिना,
मत्स्थानि, सर्वभूतानि, न, च, अहम्, तेषु, अवस्थितः।।4।।
मेरे से तथा अदृश साकार परमेश्वर से यह सर्व संसार विस्तारित व घेरा हुआ है अर्थात् पूर्ण परमात्मा द्वारा ही रचा गया है तथा वही वास्तव में नियन्तता है। तथा मेरे अन्तर्गत जो सर्व प्राणी हैं उनमें मैं स्थित नहीं हूँ। क्योंकि काल अर्थात् ज्योति निरंजन ब्रह्म अपने इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में अलग से रहता है तथा प्रत्येक ब्रह्मण्ड में भी महाब्रह्मा, महाविष्णु,महाशिव रूप में भिन्न गुप्त रहता है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 में भी है। गीता अध्याय 13 श्लोक 17 में तथा अध्याय 18 श्लोक 61 में भी यही प्रमाण है कहा है कि पूर्ण परमात्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। वह सर्व प्राणियों को यन्त्रा की तरह भ्रमण कराता है।

न, च, मत्स्थानि, भूतानि, पश्य, मे, योगम्, ऐश्वरम्,
भूतभृत्, न, च, भूतस्थः, मम, आत्मा, भूतभावनः।।5।।
और सब प्राणी मेरे में स्थित नहीं हैं और न ही मेरी आत्मा जीव उत्पन्न करने वाला जान वह परम शक्ति युक्त पूर्ण परमात्मा प्राणियों का धारण पोषण करने वाला अभेद सम्बन्ध शक्ति से प्राणियों में स्थित है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में भी है कि पूर्ण परमात्मा कोई और है, वह सर्व जगत का पालन-पोषण करता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 13 श्लोक 17 अध्याय 18 श्लोक 61 में है कहा है कि पूर्ण परमात्मा सर्व प्राणियों के हृदय में विशेष रूप से स्थित है। वह पूर्ण परमात्मा अपनी शक्ति से सर्व प्राणियों को यन्त्रा की तरह भ्रमण कराता है।

यथा, आकाशस्थितः, नित्यम्, वायुः, सर्वत्रागः, महान्,
तथा, सर्वाणि, भूतानि, मत्स्थानि, इति, उपधारय।।6।।
जैसे सर्वत्रा विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी नियमित स्थित हैं ऐसा समझ।

सर्वभूतानि, कौन्तेय, प्रकृतिम्, यान्ति, मामिकाम्।
कल्पक्षये, पुनः, तानि, कल्पादौ, विसृृजामि, अहम्।।7।।
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं ओर कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हँू।

प्रकृृतिम्, स्वाम्, अवष्टभ्य, विसृृजामि, पुनः, पुनः।
भूतग्रामम्, इमम्, कृत्थ्म्, अवशम्,प्रकृतेः,वशात्।।8।।
अपनी प्रकृति अर्थात् दुर्गा को अंगीकार करके अर्थात् पति-पत्नी रूप में रखकर स्वभाव के बल से परतन्त्रा हुए इस सम्पूर्ण प्राणी समुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ।

न, च, माम्, तानि, कर्माणि, निबध्नन्ति, धन×जय,
उदासीनवत्, आसीनम्, असक्तम्, तेषु, कर्मसु।।9।।
हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।

मया, अध्यक्षेण, प्रकृतिः, सूयते, सचराचरम्,
हेतुना, अनेन, कौन्तेय, जगत्, विपरिवर्तते।।10।।
हे अर्जुन! मुझे मालिक रूप में स्वीकार करने के कारण प्रकृति चराचरसहित सर्वजगत्को पैदा करती है इस हेतु से ही यह संसार चक्र घूम रहा है।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana