गीता अध्याय 06 : 1-10

अनाश्रितः, कर्मफलम्, कार्यम्, कर्म, करोति, यः,
सः, सन्यासी, च, योगी, च, न, निरग्निः, न, च, अक्रियः।।1।।
जो साधक कर्मफल का आश्रय न लेकर शास्त्रा विधि अनुसार करने योग्य भक्ति कर्म करता है वह सन्यासी अर्थात् शास्त्रा विरुद्ध साधना कर्मों को त्यागा हुआ व्यक्ति तथा योगी अर्थात् भक्त है और वासना रहित नहीं है तथा केवल (अक्रियः) एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर लोक दिखावा करके क्रियाओंका त्याग करने वाला भी योगी नहीं है। भावार्थ है कि जो हठ योग करके दम्भ करता है मन में विकार है, ऊपर से निष्क्रिय दिखता है वह न सन्यासी है, न ही कर्मयोगी अर्थात् भक्त है।

यम्, सन्यासम्, इति, प्राहुः, योगम्, तम्, विद्धि पाण्डव,
न, हि, असन्यस्तसङ्कल्पः, योगी, भवति, कश्चन।।2।।
हे अर्जुन! जिसको सन्यास ऐसा कहते हैं उस भक्ति ज्ञान योग को जान क्योंकि संकल्पों त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
गरीब, एक नारी त्याग दीन्हीं, पाँच नारी गैल बे।
पाया न द्वारा मुक्ति का, सुखदेव करी बहु सैल बे।।
भावार्थ है कि एक पत्नी को त्याग कर सन्यास प्रस्त हो गए परंतु पाँच विकार(काम, क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार) रूपी पत्नियाँ साथ ही हैं अर्थात् संकल्प अभी भी रहे, ये त्यागो, तब सन्यासी होवोगे। जैसे सुखदेव जी सन्यासी बन कर बहुत फिरा परंतु मान-बड़ाई नहीं त्यागी जिसके कारण विफल रहा।

आरुरुक्षोः, मुनेः, योगम्, कर्म, कारणम्, उच्यते,
योगारूढस्य, तस्य, एव, शमः, कारणम्, उच्यते।।3।।
योग अर्थात् भक्ति में आरूढ़ होने की इच्छावाले मननशील साधक के लिये शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म करना ही हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य कहा जाता है उस भक्ति में संलग्न साधक का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है वही वास्तव में भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु कहा जाता है।

यदा, हि, न, इन्द्रियार्थेषु, न, कर्मसु, अनुषज्जते,
सर्वसङ्कल्पसन्यासी, योगारूढः, तदा, उच्यते।।4।।
जिस समय में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है उस स्थिति में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष वास्तव में भक्ति में दृढ़ निश्चय से संलग्न कहा जाता है।

उद्धरेत्, आत्मना, आत्मानम्, न, आत्मानम्, अवसादयेत्,
आत्मा, एव, हि, आत्मनः, बन्धुः, आत्मा, एव, रिपुः, आत्मनः।।5।।
पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है के तत्वज्ञान को ध्यान में रखते हुए शास्त्रा अनुकूल साधना से अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे और अपने को बर्बाद न करे क्योंकि शास्त्रा अनुकूल साधक को पूर्ण परमात्मा विशेष लाभ प्रदान करता है वही प्रभु आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है, इसलिए वह आत्म रूप परमात्मा वास्तव में आत्माका मित्रा है और शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करने से जीवात्मा वास्तव में स्वयं का शत्राु है।

बन्धुः, आत्मा, आत्मनः, तस्य, येन, आत्मा, एव, आत्मना, जितः,
अनात्मनः, तु, शत्राुत्वे, वर्तेत, आत्मा, एव, शत्राुवत्।।6।।
जो आत्मा शास्त्रानुकूल साधना करता है उसका पूर्ण परमात्मा ही साथी है जिस कारण से वास्तव में शास्त्रा अनुकूल साधक की आत्मा के साथ पूर्ण परमात्मा की शक्ति विशेष कार्य करती है जैसे बिजली का कनेक्शन लेने पर मानव शक्ति से न होने वाले कार्य भी आसानी से हो जाते हैं। ऐसे पूर्ण परमात्मा से जीवात्मा की विजय होती है अर्थात् सर्व कार्य सिद्ध तथा सर्व सुख प्राप्त होता है तथा परमगति को अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है तथा मन व इन्द्रियों पर भी वही विजय प्राप्त करता है। परन्तु इसके विपरीत जो शास्त्रा अनुकूल साधना नहीं करते उनकी आत्मा को पूर्ण प्रभु का विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होता, वह केवल कर्म संस्कार ही प्राप्त करता रहता है इसलिए पूर्ण प्रभु के सहयोग रहित जीवात्मा स्वयं दुश्मन जैसा व्यवहार करता है वास्तव में वह साधक अपना ही शत्राु तुल्य है अर्थात् शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजायें करने वाले को न तो सुख प्राप्त होता है न ही कार्य सिद्ध होता है, न परमगति ही प्राप्त होती है, प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 16 मंत्र 23-24।

जितात्मनः, प्रशान्तस्य, परमात्मा, समाहितः,
शीतोष्णसुखदुःखेषु, तथा, मानापमानयोः।।7।।
उपरोक्त श्लोक 6 में जिस विजयी आत्मा का विवरण है उसी से सम्बन्धित है कि वह परमात्मा के कृप्या पात्रा विजयी आत्मा अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने से प्रभु से सर्व सुख व कार्य सिद्धि प्राप्त हो रही है वह पूर्ण संतुष्ट साधक पूर्ण प्रभु के ऊपर पूर्ण रूपेण आश्रित है अर्थात् उसको किसी अन्य से लाभ की चाह नहीं रहती। वह तो सर्दी व गर्मी अर्थात् सुख व दुःख में तथा मान व अपमान में भी प्रभु की इच्छा जान कर ही निश्चिंत रहता है।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा, कूटस्थः, विजितेन्द्रियः,
युक्तः, इति, उच्यते, योगी, समलोष्टाश्मका×चनः।। 8।।
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान से तृप्त है जिसकी जीवात्मा की स्थिति विकाररहित है प्रभु के सहयोग से जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी पत्थर और सुवर्ण समान हैं वह शास्त्रा अनुकूल साधक युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है यह अन्तिम ठीक सही भक्ति करने वाला कहा जाता है।

सुहृद् मित्रा अरि उदासीन मध्यस्थ द्वेष्य बन्धुषु,
साधुषु, अपि, च, पापेषु, समबुद्धिः, विशिष्यते।।9।।
सुहृद्, मित्रा, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुगणों में धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।(श्लोक 10 से 15 में ब्रह्म ने अपनी पूजा के ज्ञान की अटकल लगाई है)

योगी, युजीत, सततम्, आत्मानम्, रहसि, स्थितः,
एकाकी, यतचित्तात्मा, निराशीः, अपरिग्रहः।।10।।
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला आशारहित और संग्रहरहित साधक अकेला ही एकान्त स्थान में रहता है तथा स्थित होकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगावे।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana