गीता अध्याय 05 : 1-10

सóयासम्, कर्मणाम्, कृष्ण, पुनः, योगम्, च, शंससि,
यत्, श्रेयः, एतयोः, एकम्, तत्, मे, ब्रूहि, सुनिश्चितम्।।1।।
हे कृष्ण! आप कर्मों के सन्यास अर्थात् कर्म छोड़कर आसन लगाकर कान आदि बन्द करके साधना करने की और फिर कर्मयोग की अर्थात् कर्म करते करते साधना करने की प्रशंसा करते हैं इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँती निश्चित कल्याणकारक साधन हो उसको कहिये।
भावार्थ:- अर्जुन कह रहा है कि भगवन आप एक ओर तो कह रहे हो कि काम करते करते साधना करना ही श्रेयकर है। फिर अध्याय 4 मंत्रा 25 से 30 तक में कह रहे हो कि कोई तप करके कोई प्राणायाम आदि करके कोई नाक कान बन्द करके, नाद (ध्वनि) सुन करके आदि से आत्मकल्याण मार्ग मानता है। इसलिए आप की दो तरफ (दोगली) बात से मुझे संशय उत्पन्न हो गया है कृपया निश्चय करके एक मार्ग मुझे कहिए।
कर्म सन्यास का विवरण:-
कर्म सन्यास दो प्रकार से होता है, 1. एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर हठ करके जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्रा विधि रहित साधना करता है, दूसरा घर पर रहते हुए भी हठयोग करके घण्टों एक स्थान पर बैठ कर शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करता है, ये दोनों ही कर्म सन्यासी हैं।
कर्मयोग का विवरण:-
यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल-बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या विवाह न करा कर घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ संसारिक कर्म अर्थात् सेवा करता हुआ शास्त्रा विधि अनुसार साधना करता है, ये दोनों ही कर्मयोगी हैं। दूसरी प्रकार के कर्मयोगी वे होते हैं जो बाल-बच्चों में रहते हैं तथा साधना शास्त्रा विधि त्याग कर करते हैं या शादी न करवाकर घर में रहता है या किसी आश्रम में सेवा करता है, यह भी कर्म योगी ही कहलाते हैं।

सóयासः, कर्मयोगः, च, निःश्रेयसकरौ, उभौ,
तयोः, तु, कर्मसóयासात्, कर्मयोगः, विशिष्यते।।2।।
तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से शास्त्रा विधि रहित साधना प्राप्त साधक प्रभु प्राप्ति से विशेष प्रेरित होकर गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान नाक आदि बंद करके या तप आदि करना तथा शास्त्रा विधि रहित साधना कर्म करते-करते भी करना दोनों ही व्यर्थ है अर्थात् श्रेयकर नहीं हैं तथा न करने वाली है शास्त्राविधी अनुसार साधना करने वाले जो सन्यास लेकर आश्रम में रहते हैं तथा कर्म सन्यास नहीं लेते तथा जो विवाह करा कर घर पर रहते हैं उन दोनों की साधना ही (निश्रेयसकरौ) अमंगलकारी नहीं हैं परन्तु उपरोक्त उन दोनों में भी यदि आश्रम रह कर भी काम चोर है उस कर्मसंन्यास से कर्मयोग संसारिक कर्म करते-करते शास्त्रा अनुसार साधना करना श्रेष्ठ है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 41 से 46 में कहा है कि चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्राी, वैश्य तथा शुद्र) के व्यक्ति भी अपने स्वभाविक कर्म करते हुए परम सिद्धी अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। परम सिद्धी के विषय में स्पष्ट किया है श्लोक 46 में कि जिस परमात्मा परमेश्वर से सर्व प्राणियों की उत्पति हुई है जिस से यह समस्त संसार व्याप्त है, उस परमेश्वर कि अपने-2 स्वभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त हो जाता हैं अर्थात् कर्म करता हुआ सत्य साधक पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है। अध्याय 18 श्लोक 47 में स्पष्ट किया है कि शास्त्रा विरूद्ध साधना करने वाले (कर्म सन्यास) से अपना शास्त्रा विधी अनुसार (कर्म करते हुए) साधना करने वाला श्रेष्ठ है। क्योंकि अपने कर्म करता हुआ साधक पाप को प्राप्त नहीं होता। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि कर्म सन्यास करके हठ करना पाप है। श्लोक 48 में स्पष्ट किया है कि अपने स्वाभाविक कर्मों को नहीं त्यागना चाहिए चाहे उसमें कुछ पाप भी नजर आता है। जैसे खेती करने में जीव मरते हैं आदि।
भावार्थ: उपरोक्त मंत्रा नं. 2 का भावार्थ है कि जो शास्त्रा विरुद्ध साधक हैं वे दो प्रकार के हैं,एक तो कर्म सन्यासी, दूसरे कर्म योगी। उन की दोनों प्रकार की साधना जो तत्वदर्शी सन्त के अभाव से शास्त्राविरूद्ध होने से श्रेयकर अर्थात् कल्याण कारक नहीं है तथा दोनों प्रकार की शास्त्राविरूद्ध साधना न करने वाली है। जैसे गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है कि शास्त्रा विधि को त्यागकर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा व्यर्थ है। श्लोक 24 में कहा है कि भक्ति मार्ग की जो साधना करने वाली है तथा न करने वाली उसके लिए शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। शास्त्रों में कहा है कि पूर्ण मोक्ष के लिए किसी तत्वदर्शी सन्त की खोज करो। उसी से विनम्रता से भक्ति मार्ग प्राप्त करें। प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 34ए यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 10 व 13 में इन दोनों में कर्मसन्यासी से कर्मयोगी अच्छा है, क्योंकि कर्मयोगी जो शास्त्रा विधि रहित साधना करता है, उसे जब कोई तत्वदर्शी संत का सत्संग प्राप्त हो जायेगा तो वह तुरन्त अपनी शास्त्रा विरुद्ध पूजा को त्याग कर शास्त्रा अनुकूल साधना पर लग कर आत्म कल्याण करा लेता है। परन्तु कर्म सन्यासी दोनों ही प्रकार के हठ योगी घर पर रहते हुए भी, जो कान-आंखें बन्द करके एक स्थान पर बैठ कर हठयोग करने वाले तथा घर त्याग कर उपरोक्त हठ योग करने वाले तत्वदर्शी संत के ज्ञान को मानवश स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उन्हें अपने त्याग तथा हठयोग से प्राप्त सिद्धियों का अभिमान हो जाता है तथा गृह त्याग का भी अभिमान सत्यभक्ति प्राप्ति में बाधक होता है। इसलिए शास्त्राविधि रहित कर्मसन्यासी से शास्त्रा विरुद्ध कर्मयोगी साधक ही अच्छा है।
विशेष:- गीता अध्याय 2 श्लोक 39 से 53 तक तथा अध्याय 3 श्लोक 3 में दो प्रकार की साधना बताई है। उनके विषय में कहा है कि मेरे द्वारा बताई साधना तो मेरा मत है। जो दोनों ही अमंगल कारी तथा न करने वाली है। पूर्ण ज्ञान जो मोक्षदायक है किसी तत्वदर्शी सन्त से जान गीता अध्याय 4 श्लोक 33.34 में प्रमाण है। यही प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में है कहा है शास्त्रा विरूद्ध साधना करने वाले कर्मयोगी से शास्त्राविद् योगी श्रेष्ठ है।

ज्ञेयः, सः, नित्यसóयासी, यः, न, द्वेष्टि, न, काङ्क्षति,
निद्र्वन्द्वः, हि, महाबाहो, सुखम्, बन्धात्, प्रमुच्यते।।3।।
हे अर्जुन! जो साधक न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह तत्वदर्शी सन्यासी ही है क्योंकि राग द्वेष युक्त व्यक्ति का मन भटकता है तथा इन से रहित साधक का मन काम करते करते भी केवल प्रभु के भजन व गुणगान में लगा रहता है इसलिए वह सदा सन्यासी ही है क्योंकि वही व्यक्ति बन्धन से मुक्त होकर पूर्ण मुक्ति रूपी सुख के जानने योग्य ज्ञान को ढोल के डंके से अर्थात् पूर्ण निश्चय के साथ भिन्न-भिन्न स्वतन्त्रा होकर सही व्याख्या करता है।
भावार्थ:- इस मंत्र नं. 3 में शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले कर्मयोगी का विवरण है कि जो श्रद्धालु भक्त चाहे बाल-बच्चों सहित है या रहित है या किसी आश्रम में रहकर सतगुरु व संगत की सेवा में रत हैं। वह सर्वथा राग-द्वेष रहित होता है। वास्तव में वही सन्यासी है, वही फिर अन्य शास्त्रा विरुद्ध साधकों को पूर्ण निश्चय के साथ सत्य साधना का ज्ञान स्वतन्त्रा होकर बताता है।

साङ्ख्ययोगौ, पृथक्, बालाः, प्रवदन्ति, न, पण्डिताः,
एकम्, अपि, आस्थितः, सम्यक्, उभयोः, विन्दते, फलम्।।4।।
तत्वज्ञान के आधार से गृहस्थी व ब्रह्मचारी रहकर जो एक ही प्रकार की साधना करते हैं उन दोनों को प्रथक.2 फल प्राप्त होता है एैसा नादान कहते हैं। वे पण्डित भी नहीं हैं एक सर्व शक्तिमान परमेश्वर पर सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों समान फलरूप को तत्वज्ञान आधार से ही प्राप्त करते हैं गीता अध्याय 13 श्लोक 24.25 में विस्तृत वर्णन है।
भावार्थ है कि जो अपनी अटकलों को लगा कर कोई कहते हैं कि शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले जिन्होंने शादी नहीं करवाई है अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर घर पर या आश्रम आदि में साधना करने वाले कर्म योगी श्रेष्ठ हैं। कोई कहते हैं कि शादी करवाकर बाल बच्चों में रहकर कर्म करते करते साधना करना श्रेष्ठ है, वे दोनों ही नादान हैं, क्योंकि वास्तविक ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान तो तत्वदर्शी संत ही सही भिन्न-भिन्न बताएगा कि शास्त्राविधि अनुसार साधना से दोनों को समान फल प्राप्त होता है। तत्वदर्शी सन्त का गीता अध्याय 4 मंत्रा 34 में वर्णन है तथा तत्वदर्शी संत की पहचान गीता अध्याय 15 मंत्रा 1 से 4ए में यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 व 13 में भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा के विद्यान को तत्वदर्शी सन्त ही बताता है उस से सुनों।

यत्, साङ्ख्यैः, प्राप्यते, स्थानम्, तत्, योगैः, अपि, गम्यते,
एकम्, साङ्ख्यम्, च, योगम्, च, यः, पश्यति, सः, पश्यति।।5।।
शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने से तत्वज्ञानियों द्वारा जो स्थान अर्थात् सत्यलोक प्राप्त किया जाता है तत्वदर्शीयों से उपदेश प्राप्त करके साधारण गृहस्थी व्यक्तियों अर्थात् कर्मयोगियों द्वारा भी वही सत्यलोक स्थान प्राप्त किया जाता है और इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है वही यथार्थ देखता है अर्थात् वह वास्तव में भक्ति मार्ग जानता है
विशेष:- उपरोक्त अध्याय 5 मंत्रा 4-5 का भावार्थ है कि कोई तो कहता है कि जिसको ज्ञान हो गया है वही शादी नहीं करवाता तथा आजीवन ब्रह्मचारी रहता है वही पार हो सकता है। वह चाहे घर रहे, चाहे किसी आश्रम में रहे। कारण वह व्यक्ति कुछ ज्ञान प्राप्त करके अन्य जिज्ञासुओं को अच्छी प्रकार उदाहरण देकर समझाने लग जाता है। तो भोली आत्माऐं समझती हैं कि यह तो बहुत बड़ा ज्ञानी हो गया है। यह तो पार है, हमारा गृहस्थियों का नम्बर कहाँ है। कुछ एक कहते हैं कि बाल-बच्चों में रहता हुआ ही कल्याण को प्राप्त होता है। कारण गृहस्थ व्यक्ति दान-धर्म करता है, इसलिए श्रेष्ठ है। इसलिए कहा है कि वे तो दोनों प्रकार के विचार व्यक्त करने वाले बच्चे हैं, उन्हें विद्वान मत समझो। वास्तविक ज्ञान तो पूर्ण संत जो तत्वदर्शी है, वही बताता है कि शास्त्रा विधि अनुसार साधना गुरु मर्यादा में रहकर करने वाले उपरोक्त दोनों ही प्रकार के साधक एक जैसी ही प्राप्ति करते हैं। जो साधक इस व्याख्या को समझ जाएगा वह किसी की बातों में आकर विचलित नहीं होता। ब्रह्मचारी रहकर साधना करने वाला भक्त जो अन्य को ज्ञान बताता है, फिर उसकी कोई प्रशंसा कर रहा है कि बड़ा ज्ञानी है, परन्तु तत्व ज्ञान से परिचित जानता है कि ज्ञान तो सतगुरु का बताया हुआ है, ज्ञान से नहीं, नाम जाप व गुरु मर्यादा में रहने से मुक्ति होगी। इसी प्रकार जो गृहस्थी है वह भी जानता है कि यह भक्त जी भले ही चार मंत्रा व वाणी सीखे हुए है तथा अन्य इसके व्यर्थ प्रशंसक बने हैं, ये दोनों ही नादान हैं। मुक्ति तो नाम जाप व गुरु मर्यादा में रहने से होगी, नहीं तो दोनों ही पाप के भागी व भक्तिहीन हो जायेंगे। ऐसा जो समझ चुका है वह चाहे ब्रह्मचारी है या गृहस्थी दोनों ही वास्तविकता को जानते हैं। उसी वास्तविक ज्ञान को जान कर साधना करने वाले साधक के विषय में निम्न मंत्रों का वर्णन किया है।

सóयासः, तु, महाबाहो, दुःखम्, आप्तुम्, अयोगतः,
योगयुक्तः, मुनिः, ब्रह्म, नचिरेण, अधिगच्छति।।6।।
हे अर्जुन! इसके विपरित कर्म सन्यास से तो शास्त्रा विधि रहित साधना होने के कारण दुःख ही प्राप्त होता है तथा शास्त्रा अनुकूल साधना प्राप्त साधक प्रभु को अविलम्ब ही प्राप्त हो जाता है।

योगयुक्तः, विशुद्धात्मा, विजितात्मा, जितेन्द्रियः,
सर्वभूतात्मभूतात्मा, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते।।7।।
तत्वज्ञान तथा सत्य भक्ति से जिसका मन संस्य रहित है, इन्द्री जीता हुआ पवित्रा आत्मा और सर्व प्राणियों के मालिक की सत्यसाधना से सर्व प्राणियों को आत्मा रूप में एक समझकर तत्वज्ञान को प्राप्त प्राणी संसार में रहता हुआ सत्य साधना में लगा हुआ सांसारिक कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता अर्थात् सन्तान व सम्पत्ति में आसक्त नहीं होता। क्योंकि उसे तत्वज्ञान से ज्ञान हो जाता है कि यह सन्तान व सम्पति अपनी नहीं है। जैसे कोई व्यक्ति किसी होटल में रह रहा हो, वहाँ के नौकरों व अन्य सामान जैसे टी.वी., सोफा सेट, दूरभाष,चारपाई व जिस कमरे में रह रहा है को अपना नहीं समझता उस व्यक्ति को पता होता है कि ये वस्तुऐं मेरी नहीं हंै। इसलिए उन से द्वेष भी नहीं होता तथा लगाव भी नहीं बनता तथा अपने मूल उद्देश्य को नहीं भूलता। इसलिए जिस घर में हम रह रहे हैं, इस सर्व सम्पत्ति व सन्तान को अपना न समझ कर प्रेम पूर्वक रहते हुए प्रभु प्राप्ति की लगन लगाए रखें।

न, एव, कि×िचत्, करोमि, इति, युक्तः, मन्येत, तत्त्ववित्,
पश्यन्, श्रृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, गच्छन्, स्वपन्,।।8।।
श्वसन्, प्रलपन्, विसृजन्, गृह्णन्, उन्मिषन्, निमिषन्, अपि,
इन्द्रियाणि, इन्द्रियार्थेषु, वर्तन्ते, इति, धारयन्।। 9।।
तत्वदर्शी प्रभु में लीन योगी तो देखता हुआ सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सूँघता हुआ भोजन करता हुआ चलता हुआ सोता हुआ श्वांस लेता हुआ बोलता हुआ त्यागता हुआ ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं अर्थात् दुराचार नहीं करता इस प्रकार समझकर निःसन्देह ऐसा मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ अर्थात् ऐसा कर्म नहीं करता जो पाप दायक है।
भावार्थ है कि जो कुछ भी हो रहा है परमात्मा की कृप्या से ही हो रहा है। जीव कुछ नहीं कर सकता। परमात्मा के विद्यान अनुसार चलने वाला सुखी रहता है तथा मोक्ष प्राप्त करता है। विपरीत चलने वाले को हानी होती है।

ब्रह्मणि, आधाय, कर्माणि, संगम्, त्यक्त्वा, करोति, यः,
लिप्यते, न, सः, पापेन, पद्मपत्राम्, इव, अम्भसा।।10।।
जो पुरुष सब कर्मों को पूर्ण परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर शास्त्रा विधि अनुसार कर्म करता है वह साधक जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता अर्थात् पूर्ण परमात्मा की भक्ति से साधक सर्व बन्धनों से मुक्त हो जाता है जो पाप कर्म के कारण बन्धन बनता है।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana