गीता अध्याय 04 : 1-10

इमम्, विवस्वते, योगम्, प्रोक्तवान्, अहम्, अव्ययम्,
विवस्वान्, मनवे, प्राह, मनुः, इक्ष्वाकवे, अब्रवीत्।।1।।
मैंने इस अविनाशी भक्ति मार्ग को सूर्य से कहा था सूर्य ने अपने पुत्रा वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्रा राजा इक्ष्वाकु से कहा।

एवम्, परम्पराप्राप्तम्, इमम्, राजर्षयः, विदुः,
सः, कालेन, इह, महता, योगः, नष्टः, परन्तप।।2।।
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस भक्ति मार्ग को राजर्षियों ने जाना किंतु उसके बाद वह योग अर्थात् भक्ति मार्ग बहुत समय से इस पृथ्वी लोक में समाप्त हो गया।।2।।

सः, एव, अयम्, मया, ते, अद्य, योगः, प्रोक्तः, पुरातनः,
भक्तः, असि, मे, सखा, च, इति, रहस्यम्, हि, एतत्, उत्तमम्।।3।।
तू मेरा भक्त और सखा है इसलिये वही यह पुरातन वास्तविक भक्ति मार्ग पुराना मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य वाला है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।

अपरम्, भवतः, जन्म, परम्, जन्म, विवस्वतः,
कथम्, एतत्, विजानीयाम्, त्वम्, आदौ, प्रोक्तवान् इति।।4।।
आपका जन्म तो अधिक समय का नहीं है अर्थात् अभी हाल का है और सूर्य का जन्म अधिक पहले का है इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?

बहूनि, मे, व्यतीतानि, जन्मानि, तव, च, अर्जुन,
तानि, अहम्, वेद, सर्वाणि, न, त्वम्, वेत्थ, परन्तप।।5।।
हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता किंतु मैं जानता हूँ।

अजः, अपि, सन्, अव्ययात्मा, भूतानाम्, ईश्वरः, अपि, सन्,
प्रकृतिम्, स्वाम्, अधिष्ठाय, सम्भवामि, आत्ममायया।।6।।
मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और अविनाशी आत्मा होते हुए भी तथा मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर अपने अंश अर्थात् पुत्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार प्रकट करता हूँ।

यदा, यदा, हि, धर्मस्य, ग्लानिः, भवति, भारत,
अभ्युत्थानम्, अधर्मस्य, तदा, आत्मानम्, सृजामि, अहम्।।7।।
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब ही मैं अपना अंश अवतार रचता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।

परित्राणाय, साधूनाम्, विनाशाय, च, दुष्कृृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि, युगे, युगे।।8।।
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये बुरे कर्म करने वालों का विनाश करनेके लिये और भक्ति मार्ग को शास्त्रा अनुकूल दिशा देने के लिए युग-युग में अपने अंश प्रकट करता हूँ तथा उनमें गुप्त रूप से मैं प्रवेश करके अपनी लीला करता हूँ।

जन्म, कर्म, च, मे, दिव्यम्, एवम्, यः, वेत्ति, तत्त्वतः,
त्यक्त्वा, देहम्, पुनः, जन्म, न, एति, माम्, एति, सः, अर्जुन।।9।।
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् अलौकिक हैं इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता किंतु जो मुझ काल को तत्व से नहीं जानते मुझे ही प्राप्त होता है।
विशेष:- काल के अलौकिक जन्मों को जानने के लिए देखें अध्याय 8 में प्रलय की जानकारी।

वीतरागभयक्रोधाः, मन्मयाः, माम्, उपाश्रिताः,
बहवः, ज्ञानतपसा, पूताः, मद्भावम्, आगताः।।10।।
जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते हैं ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्रा होकर मतावलम्बी अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने वाले स्वभाव के हो चुके हैं।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana