गीता अध्याय 03 : 1-10
गीता अध्याय 03 : 1-10

ज्यायसी, चेत्, कर्मणः, ते, मता, बुद्धिः, जनार्दन,
तत्, किम्, कर्मणि, घोरे, माम्, नियोजयसि, केशव।।1।।
हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा तत्वदर्शी द्वारा दिया ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे एक स्थान पर बैठ कर इन्द्रियों को रोक कर, गर्दन व सिर को सीधा रख कर गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 तक वर्णित तथा युद्ध करने जैसे भयंकर तुच्छ कर्म में क्यों लगाते हैं।

व्यामिश्रेण, इव, वाक्येन, बुद्धिम्, मोहयसि, इव, मे,
तत्, एकम्, वद, निश्चित्य, येन, श्रेयः, अहम्, आप्नुयाम्।।2।।
इस प्रकार आप मिले हुए से अर्थात् दो तरफा वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।

लोके, अस्मिन्, द्विविधा, निष्ठा, पुरा, प्रोक्ता, मया, अनघ,
ज्ञानयोगेन, साङ्ख्यानाम्, कर्मयोगेन, योगिनाम्।।3।।
हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है उनमें से ज्ञानियों की निष्ठा तो ज्ञान योग अर्थात् अपनी ही सूझ-बूझ से निकाले भक्ति विधि के निष्कर्ष में और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से अर्थात् सांसारिक कार्य करते हुए साधना करने में होती है।

न, कर्मणाम्, अनारम्भात्, नैष्कम्र्यम्, पुरुषः, अश्नुते,
न, च, सóयसनात्, एव, सिद्धिम्, समधिगच्छति।।4।।
न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना शास्त्रों में वर्णित शास्त्रा अनुकुल साधना जो संसारिक कर्म करते-करते करने से पूर्ण मुक्ति होती है वह गति अर्थात् परमात्मा प्राप्त होता है जैसे किसी ने एक एकड़ गेहूँ की फसल काटनी है तो वह काटना प्रारम्भ करने से ही कटेगी। फिर काटने वाला कर्म शेष नही रहेगा और इसलिए कर्मों के केवल त्यागमात्रा से एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन पर बैठ कर संसारिक कर्म त्यागकर हठ योग से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है।

न, हि, कश्चित्, क्षणम्, अपि, जातु, तिष्ठति, अकर्मकृत्,
कार्यते, हि, अवशः, कर्म, सर्वः, प्रकृतिजैः, गुणैः।।5।।
निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्रा भी बिना कर्म किये नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु,तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिये बाध्य किया जाता है। (इसी का प्रमाण अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी है।)

कर्मेन्द्रियाणि, संयम्य, यः, आस्ते, मनसा, स्मरन्,
इन्द्रियार्थान्, विमूढात्मा, मिथ्याचारः, सः, उच्यते।।6।।
जो महामूर्ख मनुष्य समस्त कर्म इन्द्रियों को हठ पूर्वक ऊपर से रोक कर मन से उन ज्ञान इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है (इसी का विस्तृत वर्णन गीता अध्याय 17 श्लोक 19 में है।)

यः, तु, इन्द्रियाणि, मनसा, नियम्य, आरभते, अर्जुन,
कर्मेन्द्रियैः, कर्मयोगम्, असक्तः, सः, विशिष्यते।।7।।
किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से गहरी नजर गीता में इन्द्रियों को नियन्त्रिात अर्थात् वश में करके अनासक्त हुआ समस्त कर्म इन्द्रियों द्वारा शास्त्रा विधि अनुसार संसारी कार्य करते-करते भक्ति कर्म अर्थात् कर्मयोग का आचरण करता है वही श्रेष्ठ है।
विशेष:- उपरोक्त न करने वाले हठयोग को गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में करने को कहा है। इसलिए अर्जुन इसी अध्याय 3 के श्लोक 2 में कह रहा है कि आप की दोगली बातें मुझे भ्रम में डाल रही हैं।

नियतम्, कुरु, कर्म, त्वम्, कर्म, ज्यायः, हि, अकर्मणः,
शरीरयात्रा, अपि, च, ते, न, प्रसिद्धयेत्, अकर्मणः।।8।।
तू शास्त्राविहित कर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो तेरा शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण भी नहीं सिद्ध होगा।

यज्ञार्थात्, कर्मणः, अन्यत्रा, लोकः, अयम्, कर्मबन्धनः,
तदर्थम्, कर्म, कौन्तेय, मुक्तसंगः, समाचर।।9।।
यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान के निमित किये जाने वाले शास्त्रा विधि अनुसार कर्मोंसे अतिरिक्त शास्त्रा विधि त्याग कर दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही इस संसार में कर्मों से बँधता है अर्थात् चैरासी लाख योनियों में यातनाऐं सहन करता है।। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस शास्त्रानुकूल यज्ञ के निमित ही भलीभाँति भक्ति के शास्त्रा विधि अनुसार करने योग्य कर्म अर्थात् कर्तव्य कर्म संसारिक कर्म करता हुआ शास्त्रा अनुकूल अर्थात् विधिवत् साधना कर।
विशेष:- उपरोक्त गीता अध्याय 3 श्लोक 6 से 9 तक एक स्थान पर एकान्त में विशेष आसन पर बैठ कर कान-आंखें आदि बन्द करके हठ करने की मनाही की है तथा शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि अनुसार साधना करना श्रेयकर बताया है। प्रत्येक सद्ग्रन्थों में संसारिक कार्य करते-करते नाम जाप व यज्ञादि करने का भक्ति विद्यान बताया है।
प्रमाण:- पवित्रा गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में कहा है कि मुझ ब्रह्म का उच्चारण करके सुमरण करने का केवल एक मात्रा ओ3म् अक्षर है जो इसका जाप अन्तिम स्वांस तक कर्म करते-करते भी करता है वह मेरे वाली परमगति को प्राप्त होता है। फिर अध्याय 8 श्लोक 7 में कहा है कि हर समय मेरा सुमरण भी कर तथा युद्ध भी कर। इस प्रकार मेरे आदेश का पालन करते हुए अर्थात् संसारिक कर्म करते-करते साधना करता हुआ मुझे ही प्राप्त होगा। भले ही अपनी परमगति को गीता अध्याय 7 मंत्रा 18 में अति अश्रेष्ठ अर्थात् अति व्यर्थ बताया है। फिर भी भक्ति विधि यही है। फिर अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 तक विवरण दिया है कि चाहे उस परमात्मा अर्थात् पूर्णब्रह्म की भक्ति करो, जिसका विवरण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 व अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में दिया है। उसका भी यही विद्यान है कि जो साधक पूर्ण परमात्मा की साधना तत्वदर्शी संत से उपदेश प्राप्त करके नाम जाप करता हुआ तथा संसारिक कार्य करता हुआ शरीर त्याग कर जाता है वह उस परम दिव्य पुरुष अर्थात् पूर्ण परमात्मा को ही प्राप्त होता है। तत्वदर्शी संत का संकेत गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में दिया है। यही प्रमाण पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 तथा 15 में दिया है।
यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 का भावार्थ:- पवित्रा वेदों को बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई तो कहता है कि वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है अर्थात् आकार में कहा जाता है, कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में न आने वाला अर्थात् निराकार कहता है। उस पूर्ण परमात्मा का तत्वज्ञान तो कोई धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत ही बताऐंगे कि वास्तव में पूर्ण परमात्मा का शरीर कैसा है? वह कैसे प्रकट होता है? पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी उसी धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत से सुनों। मैं वेद ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता। फिर भी अपनी भक्ति विधि को बताते हुए अध्याय 40 मंत्रा 15 में कहा है कि मेरी साधना ओ3म् नाम का जाप कर्म करते-करते कर, विशेष आस्था के साथ सुमरण कर तथा मनुष्य जीवन का मुख्य कत्र्तव्य जान कर सुमरण कर इससे मृत्यु उपरान्त अर्थात् शरीर छूटने पर मेरे वाला अमरत्व अर्थात् मेरी परमगति को प्राप्त हो जाएगा। जैसे सूक्ष्म शरीर में कुछ शक्ति आ जाती है कुछ समय तक अमर हो जाता है। जिस कारण स्वर्ग में चला जाता है। फिर जन्म-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

सहयज्ञाः, प्रजाः, सृष्टा , पुरा, उवाच, प्रजापतिः,
अनेन, प्रसविष्यध्वम्, एषः, वः, अस्तु, इष्टकामधुक्।।10।।
प्रजापति ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहते हैं,जिसमें भण्डारे करना आदि है, इस यज्ञके द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और तुम को यह पूर्ण परमात्मा यज्ञ में प्रतिष्ठित इष्ट ही इच्छित भोग प्रदान करनेवाला हो।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana