गीता अध्याय 16

अभयम्, सत्त्वसंशुद्धिः, ज्ञानयोगव्यवस्थितिः,
दानम्, दमः, च, यज्ञः, च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम्।।1।।
निर्भय अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता ज्ञानी और दान संयम यज्ञ करने से धार्मिक शास्त्रों पठन पाठन भक्ति मार्ग में कष्ट सहना रूपी तप और आधीनता।

अहिंसा, सत्यम्, अक्रोधः, त्यागः, शान्तिः, अपैशुनम्,
दया, भूतेषु, अलोलुप्त्वम्, मार्दवम्, =ûीः, अचापलम्।।2।।
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना सत्यवादी अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना परमात्मा के लिए सिर भी सौंप दे अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित की चंचलता का अभाव निन्दादि न करना प्राणियों में दया निर्विकार कोमलता बुरे कर्मों में लज्जा चापलूसी रहित।

तेजः, क्षमा, धृतिः, शौचम्, अद्रोहः, नातिमानिता,
भवन्ति, सम्पदम्, दैवीम्, अभिजातस्य, भारत।।3।।
तेज क्षमा धैर्य शुद्धि निर्वैरी और अपने आप को नहीं पूजवावै हे अर्जुन! भक्ति भाव को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण होते हैं।
विशेष:- श्लोक 4 से 20 तक उन व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन है जो पहले कभी मानव शरीर में थे तब भी शास्त्रा विधि अनुसार साधना नहीं की। फिर अन्य योनियों व नरक आदि में तथा क्षणिक सुख स्वर्ग आदि का भोग कर फिर मानव शरीर में आते हैं तो भी स्वभाववश वैसी ही साधना व विकारों में आरुढ़ रहते हैं।

दम्भः, दर्पः, अभिमानः, च, क्रोधः, पारुष्यम्, एव, च,
अज्ञानम्, च, अभिजातस्य, पार्थ, सम्पदम्, आसुरीम्,।।4।।
हे पार्थ! पााखण्ड घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध कठोरता और अज्ञान वास्तव में ये सब राक्षसी सम्पदा के सहित उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

दैवी, सम्पत्, विमोक्षाय, निबन्धाय, आसुरी, मता,
मा, शुचः, सम्पदम्, दैवीम्, अभिजातः, असि, पाण्डव।।5।।
संत लक्षण मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिये मानी गयी है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर क्योंकि तू भक्तिभाव को लेकर उत्पन्न हुआ है।

द्वौ, भूतसर्गौ, लोके, अस्मिन्, दैवः, आसुरः, एव, च,
दैवः, विस्तरशः, प्रोक्तः, आसुरम्, पार्थ, मे, श्रृणु।।6।।
हे अर्जुन! इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो ही प्रकार की है एक तो संत-स्वभाव वाला और दूसरा राक्षसी-स्वभाव वाला उनमें से संत स्वभाव वालों का विस्तार पूर्वक विवरण पहले कहा गया अब तू राक्षसी-स्वभाव वाले मुझसे सुन।

प्रवृत्तिम्, च, निवृत्तिम्, च, जनाः, न, विदुः, आसुराः,
न, शौचम्, न, अपि, च, आचारः, न, सत्यम्, तेषु, विद्यते।।7।।
आसुर-स्वभाव वाले मनुष्य अर्थात् चाहे वे संत कहलाते हैं, चाहे उनके शिष्य या स्वयं शास्त्रा विधि रहित साधना करने वाले व्यक्ति प्रवृति और निवृति इन दोनांेको भी नहीं जानते इसलिये उनमें न तो अंतर भीतर की शुद्धि है न श्रेष्ठ आचरण है और सच्चाई भी नहीं जानी जाती है।
विशेष:- गीता अध्याय 15 श्लोक 15 तथा अध्याय 9 श्लोक 17 में वेद्यः या वेद्यम् का अर्थ जानना किया है।

असत्यम्, अप्रतिष्ठम्, ते, जगत्, आहुः, अनीश्वरम्,
अपरस्परसम्भूतम्, किम्, अन्यत्, कामहैतुकम्।।8।।
वे आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् अवस्थारहित सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के अपने-आप केवल नर-मादा के संयोग से उत्पन्न है केवल काम अर्थात् सैक्स ही इसका कारण है इसके सिवा और क्या है। ऐसी धारणा वाले प्राणी राक्षस स्वभाव के होते हैं।

एताम्, दृष्टिम्, अवष्टभ्य, नष्टात्मानः, अल्पबुद्धयः,
प्रभवन्ति, उग्रकर्माणः, क्षयाय, जगतः, अहिताः।।9।।
इस अपने दृष्टि कोण से मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके नाशात्मा जिनकी बुद्धि मन्द है वे सबका अपकार करने वाले भयंकर कर्म करने वाले क्रूरकर्मी जगत्के नाश के लिये ही उत्पन्न होते हैं।

कामम्, आश्रित्य, दुष्पूरम्, दम्भमानमदान्विताः,
मोहात्, गृहीत्वा, असद्ग्राहान्, प्रवर्तन्ते, अशुचिव्रताः।।10।।
दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओं का आश्रय लेकर अज्ञान से मिथ्या शास्त्रा विरुद्ध सिद्धान्तों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसारमंे विचरते हैं।

चिन्ताम्, अपरिमेयाम्, च, प्रलयान्ताम्, उपाश्रिताः,
कामोपभोगपरमाः, एतावत्, इति, निश्चिताः।।11।।
मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले विषय भोगों के भोगने में तत्पर रहनेवाले और इतना ही सुख है इस प्रकार मानने वाले होते हैं।

आशापाशशतैः, बद्धाः, कामक्रोधपरायणाः,
ईहन्ते, कामभोगार्थम्, अन्यायेन, अर्थस×चयान्।। 12।।
आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय-भोगों के लिये अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थाे को संग्रह करने की चेष्टा करते रहते हैं।

इदम्, अद्य, मया, लब्धम्, इमम्, प्राप्स्ये, मनोरथम्,
इदम्, अस्ति, इदम्, अपि, मे, भविष्यति, पुनः, धनम्।।13।।
मैंने आज यह प्राप्त कर लिया और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाऐगा।

असौ, मया, हतः, शत्राुः, हनिष्ये, च, अपरान्, अपि,
ईश्वरः, अहम्, अहम्, भोगी, सिद्धः, अहम्, बलवान्, सुखी।।14।।
वह शत्राु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्राुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ ऐश्वर्य को भोगने वाला हूँ। मैं सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।

आढ्यः, अभिजनवान्, अस्मि, कः, अन्यः, अस्ति, सदृशः, मया,
यक्ष्ये, दास्यामि, मोदिष्ये, इति, अज्ञानविमोहिताः।।15।।
अनेकचितविभ्रान्ताः, मोहजालसमावृताः,
प्रसक्ताः, कामभोगेषु, पतन्ति, नरके, अशुचै।।16।।
बड़ा धनी और बड़े कुटुम्बवाला या अधिक शिष्यों वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है मैं यज्ञ करूँगा दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चितवाले मोहरूप जाल से समावृत और विषय भोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्रा नरक में गिरते हैं।

आत्सम्भाविताः, स्तब्धाः, धनमानमदान्विताः,
यजन्ते, नामयज्ञैः, ते, दम्भेन, अविधिपूर्वकम्।।17।।
वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले गंदे स्वभाव पर अडिग धन और मान के मद से युक्त होकर नाम मात्रा के यज्ञों द्वारा अर्थात् मनमानी भक्ति द्वारा पाखण्ड से शास्त्रा विधि रहित पूजन करते हैं।

अहंकारम्, बलम्, दर्पम्, कामम्, क्रोधम्, च, संश्रिताः,
माम्, आत्मपरदेहेषु, प्रद्विषन्तः, अभ्यसूयकाः।।18।।
अहंकार बल घमण्ड कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले प्रत्येक शरीर में परमात्मा आत्मा सहित तथा मुझसे द्वेष करने वाले होते हैं।

तान् अहम्, द्विषतः, क्रूरान्, संसारेषु, नराधमान्,
क्षिपामि, अजस्त्राम्, अशुभान्, आसुरीषु, एव, योनिषु।।19।।
मैं उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को वास्तव में संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ।

आसुरीम्, योनिम्, आपन्नाः, मूढाः, जन्मनि, जन्मनि,
माम् अप्राप्य, एव, कौन्तेय, ततः, यान्ति, अधमाम्, गतिम्।।20।।
हे अर्जुन!वे मुर्ख मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं फिर उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकों में पड़ते हैं।
विशेष:- उपरोक्त मंत्रा 6 से 20 तक का विवरण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 तक तथा अध्याय 9 श्लोक 21 से 25 में भी है।

त्रिविधम्, नरकस्य, इदम्, द्वारम्, नाशनम्, आत्मनः,
कामः क्रोधः, तथा, लोभः, तस्मात्, एतत्, त्रायम्, त्यजेत्।।21।।
काम क्रोध तथा लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् आत्मघाती हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिये।

एतैः, विमुक्तः, कौन्तेय, तमोद्वारैः, त्रिभिः, नरः,
आचरति, आत्मनः, श्रेयः, ततः, याति, पराम्, गतिम्।।22।।
हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष आत्मा के कल्याण का आचरण करता है इससे वह परम गति को जाता है अर्थात् पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

यः, शास्त्राविधिम्, उत्सृज्य, वर्तते, कामकारतः,
न, सः, सिद्धिम्, अवाप्नोति, न, सुखम्, न, पराम्, गतिम्।।23।।
जो पुरुष शास्त्रा विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह न सिद्धि का प्राप्त होता है न परम गति को और न सुख को ही।

तस्मात्, शास्त्राम्, प्रमाणम्, ते, कार्याकार्यव्यवस्थितौ,
ज्ञात्वा, शास्त्राविधानोक्तम्, कर्म, कर्तुम्, इह, अर्हसि।।24।।
इससे तेरे लिये कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्रा ही प्रमाण है इसे जानकर शास्त्रा विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana