गीता अध्याय 12

एवम्, सततयुक्ताः, ये, भक्ताः, त्वाम्, पर्युपासते,
ये, च, अपि, अक्षरम्, अव्यक्तम्, तेषाम्, के, योगवित्तमाः।।1।।
जो भक्तजन पूर्र्वोंक्त प्रकार से निरंन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन अदृश को भी अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेता अर्थात् यथार्थ रूप से भक्ति विधि को जानने वाला कौन हैं?

मयि, आवेश्य, मनः, ये, माम्, नित्ययुक्ताः, उपासते,
श्रद्धया, परया, उपेताः, ते, मे, युक्ततमाः, मताः।।2।।
मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजते हैं,वे मुझको साधकों में अति उत्तम मान्य है ये मेरे विचार हैं।

ये, तु, अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, पर्युपासते,
सर्वत्रागम्, अचिन्त्यम्, च, कूटस्थम्, अचलम्, ध्रुवम्।।3।।
सन्नियम्य, इन्द्रियग्रामम्, सर्वत्रा, समबुद्धयः,
ते, प्राप्नुवन्ति, माम्, एव, सर्वभूतहिते, रताः।।4।।
परंतु जो इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार से वश में करके मन-बुद्धि से परे, अर्थात् तत्वज्ञान के अभाव से सर्वव्यापी और सदा एकरस रहने वाले नित्य अचल अदृश अविनाशी परमात्मा को शास्त्रों के निर्देश के विपरीत अर्थात् शास्त्राविधि त्यागकर निरंतर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सब में समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

क्लेशः, अधिकतरः, तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्,
अव्यक्ता, हि, गतिः, दुःखम्, देहवद्भिः, अवाप्यते।।5।।
उन अदृश ब्रह्ममंे आसक्तचित्त वाले पुरुषों के साधन में वाद-विवाद रूपी क्लेश अर्थात् कष्ट विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
विशेष:-- इस श्लोक 5 में क्लेश अर्थात् कष्ट का भार्वाथ है कि पूर्ण परमात्मा की साधना मन के आनन्द से विपरित चल कर की जाती है। मन चाहता है शराब पीना, तम्बाखु पीना, मांस खाना, नाचना, गाना आदि इन को त्यागना ही क्लेश कहा है। परमेश्वर की भक्ति विधि का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण आपस में वाद-विवाद करके दुःखी रहते हैं। एक दूसरे से अपने ज्ञान को श्रेष्ठ मानकर अन्य से इर्षा करते है जिस कारण से क्लेश होता है।

ये, तु, सर्वाणि, कर्माणि, मयि, सóयस्य, मत्पराः,
अनन्येन, एव, योगेन, माम्, ध्यायन्तः, उपासते।।6।।
परंतु जो मतावलम्बी मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुण रूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्ति योग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं।

तेषाम्, अहम्, समुद्धत्र्ता, मृत्युसंसारसागरात्,
भवामि, नचिरात्, पार्थ, मयि, आवेशितचेतसाम्।।7।।
हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ।

मयि, एव, मनः, आधत्स्व, मयि, बुद्धिम् निवेशय,
निवसिष्यसि, मयि, एव, अतः, ऊध्र्वम्, न, संशयः।।8।।
मुझमें मनको लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा इसमें कुछ भी संश्य नहीं है।

अथ, चित्तम्, समाधातुम्, न, शक्नोषि, मयि, स्थिरम्,
अभ्यासयोगेन, ततः, माम्, इच्छ, आप्तुम्, धन×जय।। 9।।
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिए इच्छा कर।

अभ्यासे, अपि, असमर्थः, असि, मत्कर्मपरमः, भव,
मदर्थम्, अपि, कर्माणि, कुर्वन्, सिद्धिम्, अवाप्स्यसि।।10।।
अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे प्रति शास्त्रानुकूल शुभ कर्म करने वाला हो मेरे लिए कर्मों को करता हुआ भी सिद्धि अर्थात् उद्देश्य को प्राप्त होगा।

अथ, एतत्, अपि, अशक्तः, असि, कर्तुम्, मद्योगम्, आश्रितः,
सर्वकर्मफलत्यागम्, ततः, कुरु, यतात्मवान्।।11।।
यदि मेरे मतानुसार कर्म योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है तो प्रयत्नशील हो कर सब कर्मों के फल का त्याग कर।

श्रेयः, हि, ज्ञानम्, अभ्यासात्, ज्ञानात्, ध्यानम्, विशिष्यते,
ध्यानात्, कर्मफलत्यागः, त्यागात्, शान्तिः, अनन्तरम्।।12।।
तत्वज्ञान के अभाव से शास्त्राविधि को त्याग कर मनमाने अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है शास्त्रों में वर्णित साधना न करके केवल ज्ञान ही ग्रहण करके विद्वान प्रसिद्ध होने वाले के ज्ञान से सहज ध्यान अर्थात् सहज समाधि श्रेष्ठ है और ध्यान से भी कर्मों के फल का त्याग करके नाम जाप करना श्रेष्ठ है क्योंकि कर्म फल त्याग कर भक्ति करने के कारण उस त्याग से तत्काल ही शान्ति होती है।

अद्वेष्टा, सर्वभूतानाम्, मैत्राः, करुणः, एव, च,
निर्ममः, निरहंकारः, समदुःखसुखः, क्षमी।।13।।
सन्तुष्टः, सततम्, योगी, यतात्मा, दृढनिश्चयः,
मयि, अर्पितमनोबुद्धिः, यः, मद्भक्तः, सः, मे, प्रियः।।14।।
जो सब प्राणियों में द्वेष-भाव से रहित प्रेमी और दयालु है तथा ममता से रहित अहंकार से रहित सुख दुःख में सम और क्षमावान् हैं वह योगी निरन्तर संतुष्ट है। निर्विकारी अर्थात् मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है दृढ़ निश्चयवाला है वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला नियमानुसार भक्ति करने वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

यस्मात्, न, उद्विजते, लोकः, लोकात्, न, उद्विजते, च, यः,
हर्षामर्षभयोद्वेगैः, मुक्तः, यः, सः, च, मे, प्रियः।।15।।
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है।

अनपेक्षः, शुचिः, दक्षः, उदासीनः, गतव्यथः,
सर्वारम्भपरित्यागी, यः, मद्भक्तः, सः, मे, प्रियः।।16।।
जो आकांक्षा से रहित बाहर-भीतर से शुद्ध चतुर पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है वह सब आरम्भों का त्यागी अर्थात् जिसने शास्त्राविधि विरूद्ध भक्ति कर्म आरम्भ कर रखे थे। उनको त्यागकर शास्त्राविधि अनुसार करने वाला मतानुसार मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

यः, न, हृष्यति, न, द्वेष्टि, न, शोचति, न, काङ्क्षति,
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्, यः, सः, मे, प्रियः।।17।।
जो न हर्षित होता है न द्वेष करता है न शोक करता है न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त मुझको प्रिय है।

समः, शत्रौ, च, मित्रो, च, तथा, मानापमानयोः,
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः, संगविवर्जितः।।18।।
शत्राु-मित्रा में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी गर्मी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति से रहित है।

तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी, सन्तुष्टः, येन, केनचित्,
अनिकेतः, स्थिरमतिः, भक्तिमान्, मे, प्रियः, नरः।।19।।
निन्दा स्तुति को समान समझनेवाला मननशील और जिस किसी प्रकार से संतुष्ट है और ममता और आसक्ति से रहित है वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् मनुष्य मुझको प्रिय है।

ये, तु, धम्र्यामृतम्, इदम्, यथा, उक्तम्, पर्युपासते,
श्रद्दधानाः, मत्परमाः, भक्ताः, ते, अतीव, मे, प्रियाः।।20।।
परंतु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे से उत्तम परमात्मा को शास्त्रानुकूल साधना के परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को पूर्ण श्रद्धा से पूजा अर्थात् उपासना करते हैं वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana