गीता अध्याय 11

मदनुग्रहाय, परमम्, गुह्यम्, अध्यात्मस×िज्ञतम्,
यत्, त्वया, उक्तम्, वचः, तेन, मोहः, अयम्, विगतः, मम।।1।।
आपने कृप्या करने के लिए शास्त्रों के अनुकूल विचार जो श्रेष्ठ गुप्त अध्यात्मिकविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया।

भवाप्ययौ, हि, भूतानाम्, श्रुतौ, विस्तरशः, मया,
त्वत्तः, कमलपत्राक्ष, माहात्म्यम्, अपि, च, अव्ययम्।।2।।
क्योंकि हे कमलनेत्रा! मैंने आपसे प्राणियों की उत्पति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।

एवम्, एतत्, यथा, आत्थ, त्वम्, आत्मानम्, परमेश्वर,
द्रष्टुम्, इच्छामि, ते, रूपम्, ऐश्वरम्, पुरुषोत्तम।।3।।
हे परमेश्वर!आप अपने को जैसा कहते हैं यह ठीक ऐसा ही है परंतु हे पुरुषोत्तम्! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, याक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ईश्वरीय-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

मन्यसे, यदि, तत्, शक्यम्, मया, द्रष्टुम्, इति, प्रभो,
योगेश्वर, ततः, मे, त्वम्, दर्शय, आत्मानम्, अव्ययम्।।4।।
हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है ऐसा आप मानते हंै तो हे योगेश्वर! आप असली अविनाशी स्वरूप के मुझे दर्शन कराइये।

पश्य, मे, पार्थ, रूपाणि, शतशः, अथ, सहस्त्राशः,
नानाविधानि, दिव्यानि, नानावर्णाकृतीनि, च।।5।।
हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों देख।

पश्य, आदित्यान्, वसून्, रुद्रान्, अश्विनौ, मरुतः, तथा,
बहूनि, अदृष्टपूर्वाणि, पश्य, आश्चर्याणि, भारत।।6।।
हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रों को आठ वसुओं को एकादश रुद्रों को दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्रणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।

इह, एकस्थम्, जगत्, कृृत्स्न्नम्, पश्य, अद्य, सचराचरम्,
मम, देहे, गुडाकेश, यत्, च, अन्यत्, द्रष्टुम्, इच्छसि।।7।।
हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।

न, तु, माम्, शक्यसे, द्रष्टुम्, अनेन, एव, स्वचक्षुषा,
दिव्यम्, ददामि, ते, चक्षुः, पश्य, मे, योगम्, ऐश्वरम्।।8।।
परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।

एवम्, उक्त्वा, ततः, राजन्, महायोगेश्वरः, हरिः,
दर्शयामास, पार्थाय, परमम्, रूपम्, ऐश्वरम्।।9।।
हे राजन्! महायोगेश्वर और भगवान्ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त स्वरूप दिखलाया।

अनेकवक्त्रानयनम्, अनेकाद्भुतदर्शनम्,
अनेकदिव्याभरणम्, दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।10।।
दिव्यमाल्याम्बरधरम्, दिव्यगन्धानुलेपनम्,
सर्वाश्चर्यमयम्, देवम्, अनन्तम्, विश्वतोमुखम्।।11।।
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त अनेक अद्धभुत दर्शनों वाले बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को हाथोंमें उठाये हुए दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गन्धका सारे शरीर में लेप किये हुए सब प्रकार के आश्चयर्कों से युक्त सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप भगवान को अर्जुन ने देखा।

दिवि, सूर्यसहस्त्रास्य, भवेत्, युगपत्, उत्थिता,
यदि, भाः, सदृशी, सा, स्यात्, भासः, तस्य, महात्मनः।।12।।
आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो वह भी उस परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो।

तत्रा, एकस्थम्, जगत्, कृृत्स्न्नम्, प्रविभक्तम्, अनेकधा,
अपश्यत्, देवदेवस्य, शरीरे, पाण्डवः, तदा।।13।।
पाण्डु पुत्रा अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत्को देवों के देव श्रीकृृष्ण भगवान्के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।

ततः, सः, विस्मयाविष्टः, हृष्टरोमा, धन×जयः,
प्रणम्य, शिरसा, देवम्, कृृता×जलिः, अभाषत।। 14।।
उसके अनन्तर वह आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन काल देव से सिरसे प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।

पश्यामि, देवान्, तव, देव, देहे, सर्वान्, तथा, भूतविशेषसंघान्, ब्रह्माणम्,
ईशम्, कमलासनस्थम्, ऋषीन्, च, सर्वान्, उरगान्, च, दिव्यान्।।15।।
हे देव! आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ।

अनेकबाहूदरवक्त्रानेत्राम्, पश्यामि, त्वाम्, सर्वतः, अनन्तरूपम्, न, अन्तम्,
न, मध्यम्, न, पुनः, तव, आदिम्, पश्यामि, विश्वेश्वर, विश्वरूप।।16।।
हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ न मध्य को और न आदि को ही।

किरीटिनम्, गदिनम्, चक्रिणम्, च, तेजोराशिम्, सर्वतः, दीप्तिमन्तम्,
पश्यामि, त्वाम्, दुर्निरीक्ष्यम्, समन्तात्, दीप्तानलार्कद्युतिम्, अप्रमेयम्।।17।।
आपको मैं मुकुटयुक्त गदायुक्त और( चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज पुंज के प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृृश ज्योतियुक्त कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हँू।

त्वम्, अक्षरम्, परमम्, वेदितव्यम्, त्वम्, अस्य, विश्वस्य, परम्, निधानम्, त्वम्,
अव्ययः, शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातनः, त्वम्, पुरुषः, मतः, मे।।18।।
आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं आप ही इस जगत्के परम आश्रय हैं आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं ऐसा मेरा मत है।

अनादिमध्यान्तम्, अनन्तवीर्यम्, अनन्तबाहुम्, शशिसूर्यनेत्राम्,
पश्यामि, त्वाम्, दीप्तहुताशवक्त्राम्, स्वतेजसा, विश्वम्, इदम्, तपन्तम्।।19।।
आपको आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्त सामथ्र्य से युक्त अनन्त भुजा वाले चन्द्र सूर्यरूप नेत्रों वाल प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत्को संतप्त करते हुए देखता हूँ।

द्यावापृृथिव्योः, इदम्, अन्तरम्, हि, व्याप्तम्, त्वया, एकेन, दिशः, च, सर्वाः,
दृष्टवा, अद्भुतम्, रूपम्, उग्रम्, तव, इदम्, लोकत्रायम्, प्रव्यथितम्, महात्मन्।। ृ 20।।
हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।

अमी, हि, त्वाम्, सुरसंघा, विशन्ति, केचित्, भीताः।
प्रा×जलयः, ग ृृणन्ति, स्वस्ति, इति, उक्त्वा, महर्षिसिद्धसंघाः,
स्तुवन्ति, त्वाम्, स्तुतिभिः, पुष्कलाभिः।।21।।
वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय ‘कल्याण हो‘ ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं। फिर भी आप उन्हें खा रहे हो।

रुद्रादित्याः, वसवः, ये, च, साध्याः, विश्वे, अश्विनौ, मरुतः, च, ऊष्मपाः,
च, गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः, वीक्षन्ते, त्वाम्, विस्मिताः, च, एव, सर्वे।।22।।
जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य और आठ वसु, साधकगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुदग्ण और पितरों का समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं वे सब ही विस्मित होकर आप को देखते हंै।

रूपम्, महत्, ते, बहुवक्त्रानेत्राम्, महाबाहो, बहुबाहूरुपादम्,
बहूदरम्, बहुदंष्ट्राकरालम्, दृृष्टवा, लोकाः, प्रव्यथिताः, तथा, अहम्।।23।।
हे महाबाहो आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले बहुत उदरोंवाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान् रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।

नभःस्पृृशम्, दीप्तम्, अनेकवर्णम्, व्यात्ताननम्, दीप्तविशालनेत्राम्,
दृष्टवा, हि, त्वाम्, प्रव्यथितान्तरात्मा, धृृतिम्, न, विन्दामि, शमम्, च, विष्णो।।24।।
क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करनेवाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।

दंष्ट्राकरालानि, च, ते, मुखानि, दृष्टवा, एव, कालानलसन्निभानि,
दिशः, न, जाने, न, लभे, च, शर्म, प्रसीद, देवेश, जगन्निवास।।25।।
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय काल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।

अमी, च, त्वाम्, धृतराष्ट्रस्य, पुत्राः, सर्वे, सह, एव, अवनिपालसंघैः,
भीष्मः, द्रोणः, सूतपुत्राः, तथा, असौ, सह, अस्मदीयैः, अपि, योधमुख्यैः।।26।।
वक्त्राणि, ते, त्वरमाणाः, विशन्ति, दंष्ट्राकरालानि, भयानकानि, केचित्,
विलग्नाः, दशनान्तरेषु, संदृश्यन्ते, चूर्णितैः, उत्तमांगैः।।27।।
वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्रा राजाओं के समुदायसहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दीख रहे हैं।

यथा, नदीनाम्, बहवः, अम्बुवेगाः, समुद्रम्, एव, अभिमुखाः, द्रवन्ति, तथा,
तव, अमी, नरलोकवीराः, विशन्ति, वक्त्राणि, अभिविज्वलन्ति।।28।।
जैसे नदियों के बहुत से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक अर्थात् इस पृृथ्वी लोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

यथा, प्रदीप्तम्, ज्वलनम्, पतंगाः, विशन्ति, नाशाय, समृद्धवेगाः,
तथा, एव, नाशाय, विशन्ति, लोकाः, तव, अपि, वक्त्राणि, समृद्धवेगाः।।29।।
जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिये प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं,वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।

लेलिह्यसे, ग्रसमानः, समन्तात्, लोकान्, समग्रान्, वदनैः, ज्वलद्भिः,
तेजोभिः, आपूर्य, जगत्, समग्रम्, भासः, तव, उग्राः, प्रतपन्ति, विष्णो।।30।।
सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं, हे विष्णो! आपका भयानक प्रकाश सम्पूर्ण जगत्को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।

आख्याहि, मे, कः, भवान्, उग्ररूपः, नमः, अस्तु, ते, देववर, प्रसीद, विज्ञातुम्,
इच्छामि, भवन्तम्, आद्यम्, न, हि, प्रजानामि, तव, प्रवृत्तिम्।।31।।
मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूप वाले कौंन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो आप प्रसन्न होइये। आदियम अर्थात् पुरातन काल आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृृत्ति को नहीं जानता।

कालः, अस्मि, लोकक्षयकृृत्, प्रवृृद्धः, लोकान्, समाहर्तुम्, इह, प्रवृृत्तः,
ऋते, अपि, त्वाम्, न, भविष्यन्ति, सर्वे, ये, अवस्थिताः, प्रत्यनीकेषु, योधाः।।32।।
लोकांे का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रकट हुआ हूँ इसलिये जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करने से भी इन सबका नाश हो जायेगा।

तस्मात्, त्वम्, उत्तिष्ठ, यशः, लभस्व, जित्वा, शत्राून्,
भुङ्क्ष्व, राज्यम्, समृद्धम्, मया, एव, एते, निहताः,,
पूर्वम्, एव, निमित्तमात्राम्, भव, सव्यसाचिन्।33।।
अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्राुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्त मात्रा बन जा।

द्रोणम्, च, भीष्मम्, च, जयद्रथम्, च, कर्णम्, तथा, अन्यान्, अपि, योधवीरान्,
मया, हतान्, त्वम्, जहि, मा, व्यथिष्ठाः, युध्यस्व, जेतासि, रणे, सपत्नान्।।34।।
द्रोणाचार्य और, भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिए युद्ध कर।

एतत्, श्रुत्वा, वचनम्, केशवस्य, कृृता×जलिः, वेपमानः, किरीटी, नमस्क ृत्वा,
भूयः, एव, आह, कृृष्णम्, सग०दम्, भीतभीतः, प्रणम्य।।35।।
केशव भगवान्के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान् श्रीकृृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोला -

स्थाने, हृषीकेश, तव, प्रकीत्र्या, जगत्, प्रहृष्यति, अनुरज्यते, च,
रक्षांसि, भीतानि, दिशः, द्रवन्ति, सर्वे, नमस्यन्ति, च, सिद्धसंघाः।।36।।
हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम-गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षसलोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।

कस्मात्, च, ते, न, नमेरन्, महात्मन्, गरीयसे, ब्रह्मणः,
अपि, आदिकत्र्रो, अनन्त, देवेश, जगन्निवास,
त्वम्, अक्षरम्, सत्, असत्, तत्परम्, यत्।।37।।
हे महात्मन्! समर्थ प्रभु भी आदिकत्र्ता भी है और सबसे बड़े भी हैं आपके लिये ये कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत् असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हैं, वह आप ही हैं।

त्वम्, आदिदेवः, पुरुषः, पुराणः, त्वम्, अस्य, विश्वस्य,
परम्, निधानम्, वेत्ता, असि, वेद्यम्, च, परम्, च,
धाम, त्वया, ततम्, विश्वम्, अनन्तरूप।।38।।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत्के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।

वायुः, यमः, अग्निः, वरुणः, शशांक, प्रजापतिः, त्वम्, प्रपितामहः, च,
नमः, नमः, ते, अस्तु, सहस्त्राकृत्वः, पुनः, च, भूयः, अपि, नमः, नमः, ते।। ृ 39।।
आप वायु यमराज अग्नि वरुण चन्द्रमा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिये हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिये फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!

नमः, पुरस्तात्, अथ, पृष्ठतः, ते, नमः, अस्तु, ते, सर्वतः, एव, सर्व,
अनन्तवीर्य, अमितविक्रमः, त्वम्, सर्वम्, समाप्नोषि, ततः, असि, सर्वः।।40।।
हे अनन्त सामथ्र्यवाले! आपके लिये आगे से और पीछे से भी नमस्कार हे सर्वात्मन्! आपके लिये सब ओरस ही नमस्कार हो क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप सब संसार को व्याप्त किये हुए हैं इससे आप ही सर्वरूप हैं।

सखा, इति, मत्वा, प्रसभम्, यत्, उक्तम्, हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे,
इति, अजानता, महिमानम्, तव, इदम्, मया, प्रमादात्, प्रणयेन, वा, अपि।।41।।
यत्, च, अवहासार्थम्, असत्कृतः, असि, विहारशय्यासनभोजनेषु,
एकः, अथवा, अपि, अच्युत, तत्समक्षम्, तत्, क्षामये, त्वाम्, अहम्, अप्रमेयम्।।42।।
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर पे्रम से अथवा प्रमाद से भी मैंने हे कृृष्ण हे यादव! हे सखे! इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे समझे हठात् कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिये विहार, शय्या आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गये हैं वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

पिता, असि, लोकस्य, चराचरस्य, त्वम्, अस्य, पूज्यः, च, गुरुः, गरीयान्,
न, त्वत्समः, अस्ति, अभ्यधिकः, कुतः, अन्यः, लोकत्राये, अपि, अप्रतिमप्रभाव।।43।।
आप इस चराचर जगत्के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लाकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।

तस्मात्, प्रणम्य, प्रणिधाय, कायम्, प्रसादये, त्वाम्, अहम्, ईशम्, ईड्यम्,
पिता, इव, पुत्रास्य, सखा, इव, सख्युः, प्रियः, प्रियायाः, अर्हसि, देव, सोढुम्।।44।।
अतऐव प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर प्रणाम करके स्तुति करने योग्य आप प्रभु को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ हे देव! पिता जैसे पुत्रा के सखा जैसे सखा के और प्रेमी पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं।

अदृष्टपूर्वम्, हृषितः, अस्मि, दृष्टवा, भयेन, च, प्रव्यथितम्, मनः,
मे, तत्, एव, मे, दर्शय, देवरूपम्, प्रसीद, देवेश, जगन्निवास।।45।।
पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइये। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइये।

किरीटिनम्, गदिनम्, चक्रहस्तम्, इच्छामि, त्वाम्, द्रष्टुम्, अहम्,
तथा, एव, तेन, एव, रूपेण, चतुर्भुजेन, सहस्रबाहो, भव, विश्वमूर्ते।।46।।
मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिये हुए देखना चाहता हूँ, हे विश्वस्वरूप! हे सहस्स्रबाहो! आप उसी चतुर्भुजरूप से प्रकट होइये।

मया, प्रसन्नेन, तव, अर्जुन, इदम्, रूपम्, परम्, दर्शितम्, आत्मयोगात्,
तेजोमयम्, विश्वम्, अनन्तम्, आद्यम्, यत्, मे, त्वदन्येन, न, दृष्टपूर्वम्।।47।।
हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योग शक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखलाया है जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।

न, वेदयज्ञाध्ययनैः, न, दानैः, न, च, क्रियाभिः, न, तपोभिः,
उग्रैः, एवंरूपः, शक्यः, अहम्, नृलोके, द्रष्टुम्, त्वदन्येन, कुरुप्रवीर।।48।।
हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद अध्ययन से, न यज्ञों से न दान से न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे के द्वारा देखा जा सकता हूँ।

मा, ते, व्यथा, मा, च, विमूढभावः, दृष्टवा, रूपम्, घोरम्, ईदृक्, मम, इदम्,
व्यपेतभीः, प्रीतमनाः, पुनः, त्वम्, तत्, एव, मे, रूपम्, इदम्, प्रपश्य।।49।।
मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस रूप को फिर देख।

इति, अर्जुनम्, वासुदेवः, तथा, उक्त्वा, स्वकम्, रूपम्, दर्शयामास, भूयः,
आश्वासयामास, च, भीतम्, एनम्, भूत्वा, पुनः, सौम्यवपुः, महात्मा।।50।।
वासुदेव भगवान्ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखलाया और फिर महात्मा कृृष्ण सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

दृष्टवा, इदम्, मानुषम्, रूपम्, तव, सौम्यम्, जनार्दन,
इदानीम्, अस्मि, संवृत्तः, सचेताः, प्रकृतिम्, गतः।।51।।
हे जनार्दन! आपके इस अतिशान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिर-चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।

सुदुर्दर्शम्, इदम्, रूपम्, दृष्टवान्, असि, यत्, मम।
देवाः, अपि, अस्य, रूपस्य, नित्यम्, दर्शनकाङ्क्षिणः।।52।।
मेरा जो चतुर्भुज रूप देखा है, यह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकाड्क्षा करते रहते हैं।

न, अहम्, वेदैः, न, तपसा, न, दानेन, न, च, इज्यया।
शक्यः, एवंविधः, द्रष्टुम्, दृष्टवान्, असि, माम्, यथा।।53।।
जिस प्रकार तुमने मुझको चतुर्भुज रूप में देखा है इस प्रकार मैं न वेदों से न तप से न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ।

भक्त्या, तु, अनन्यया, शक्यः, अहम्, एवंविधः, अर्जुन।
ज्ञातुम्, द्रष्टुम्, च, तत्त्वेन्, प्रवेष्टुम्, च, परन्तप।।54।।
परंतु हे परन्तप अर्जुन! अनन्यभक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूप में मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये और तत्व से जानने के लिये तथा मेरे काल-जाल में भली-भाँति प्रवेश करने के लिए शक्य हूँ अर्थात् शुलभ हूँ।

मत्कर्मकृत्, मत्परमः, मद्भक्तः, संगवर्जितः,
निर्वैरः, सर्वभूतेषु, यः, सः, माम्, एति, पाण्डव।।55।।
हे अर्जुन! जो मेरे प्रति शास्त्रानुकूल सम्पूर्ण कत्र्तव्य-कर्मों को करनेवाला है, मेरे मतानुसार श्रेष्ठ मतावलम्बी मेरा भक्त आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण प्राणियों में वैर भाव से रहित है वह मुझको ही प्राप्त होता है। अर्थात् मेरे ब्रह्म लोक में बने महास्वर्ग में आ जाता है। जहाँ कभी.2 विष्णु रूप में यह काल दर्शन देता है। ब्रह्म काल को वास्तविक रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता।
मतानुसार अर्थात् वेदों में वर्णित साधना के अनुसार {ब्रह्म साधना का मत(विचार) वेदों में वर्णन है या अब गीता जी में} जो साधक साधना करता है वह उत्तम साधक कहलाता है। क्योंकि अन्य साधना जो शास्त्रानुकूल नहीं है उसको करने वाले पापी तथा राक्षस स्वभाव के कहें हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 18, 20 से 23 तक में विस्तृत विवरण कहा है तथा शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा करना व्यर्थ है, (प्रमाण गीता जी के अध्याय 16 के श्लोक 23,24) वह भी काल को ही प्राप्त होता है अर्थात् काल(ज्योति निरंजन) के जाल में ही रहता है। पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने की विधि से गीता बोलने वाला भगवान भी अपरिचित है। इसलिए कहा है कि तत्वदर्शी संतों को खोज(गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा अध्याय18 श्लोक 62)।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana