गीता अध्याय 04

इमम्, विवस्वते, योगम्, प्रोक्तवान्, अहम्, अव्ययम्,
विवस्वान्, मनवे, प्राह, मनुः, इक्ष्वाकवे, अब्रवीत्।।1।।
मैंने इस अविनाशी भक्ति मार्ग को सूर्य से कहा था सूर्य ने अपने पुत्रा वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्रा राजा इक्ष्वाकु से कहा।

एवम्, परम्पराप्राप्तम्, इमम्, राजर्षयः, विदुः,
सः, कालेन, इह, महता, योगः, नष्टः, परन्तप।।2।।
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस भक्ति मार्ग को राजर्षियों ने जाना किंतु उसके बाद वह योग अर्थात् भक्ति मार्ग बहुत समय से इस पृथ्वी लोक में समाप्त हो गया।।2।।

सः, एव, अयम्, मया, ते, अद्य, योगः, प्रोक्तः, पुरातनः,
भक्तः, असि, मे, सखा, च, इति, रहस्यम्, हि, एतत्, उत्तमम्।।3।।
तू मेरा भक्त और सखा है इसलिये वही यह पुरातन वास्तविक भक्ति मार्ग पुराना मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य वाला है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है।

अपरम्, भवतः, जन्म, परम्, जन्म, विवस्वतः,
कथम्, एतत्, विजानीयाम्, त्वम्, आदौ, प्रोक्तवान् इति।।4।।
आपका जन्म तो अधिक समय का नहीं है अर्थात् अभी हाल का है और सूर्य का जन्म अधिक पहले का है इस बात को कैसे समझूँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?

बहूनि, मे, व्यतीतानि, जन्मानि, तव, च, अर्जुन,
तानि, अहम्, वेद, सर्वाणि, न, त्वम्, वेत्थ, परन्तप।।5।।
हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता किंतु मैं जानता हूँ।

अजः, अपि, सन्, अव्ययात्मा, भूतानाम्, ईश्वरः, अपि, सन्,
प्रकृतिम्, स्वाम्, अधिष्ठाय, सम्भवामि, आत्ममायया।।6।।
मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और अविनाशी आत्मा होते हुए भी तथा मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर अपने अंश अर्थात् पुत्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार प्रकट करता हूँ।

यदा, यदा, हि, धर्मस्य, ग्लानिः, भवति, भारत,
अभ्युत्थानम्, अधर्मस्य, तदा, आत्मानम्, सृजामि, अहम्।।7।।
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब ही मैं अपना अंश अवतार रचता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।

परित्राणाय, साधूनाम्, विनाशाय, च, दुष्कृृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि, युगे, युगे।।8।।
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये बुरे कर्म करने वालों का विनाश करनेके लिये और भक्ति मार्ग को शास्त्रा अनुकूल दिशा देने के लिए युग-युग में अपने अंश प्रकट करता हूँ तथा उनमें गुप्त रूप से मैं प्रवेश करके अपनी लीला करता हूँ।

जन्म, कर्म, च, मे, दिव्यम्, एवम्, यः, वेत्ति, तत्त्वतः,
त्यक्त्वा, देहम्, पुनः, जन्म, न, एति, माम्, एति, सः, अर्जुन।।9।।
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् अलौकिक हैं इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता किंतु जो मुझ काल को तत्व से नहीं जानते मुझे ही प्राप्त होता है।
विशेष:- काल के अलौकिक जन्मों को जानने के लिए देखें अध्याय 8 में प्रलय की जानकारी।

वीतरागभयक्रोधाः, मन्मयाः, माम्, उपाश्रिताः,
बहवः, ज्ञानतपसा, पूताः, मद्भावम्, आगताः।।10।।
जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते हैं ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्रा होकर मतावलम्बी अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने वाले स्वभाव के हो चुके हैं।

ये, यथा, माम्, प्रपद्यन्ते, तान्, तथा, एव, भजामि, अहम्,
मम्, वत्र्म, अनुवर्तन्ते, मनुष्याः, पार्थ, सर्वशः।।11।।
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनका पूरा ध्यान रखता हूँ वास्तव में सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही व्यवहार का अनुसरण करते हैं।

काङ्क्षन्तः, कर्मणाम्, सिद्धिम्, यजन्ते, इह, देवताः,
क्षिप्रम्, हि, मानुषे, लोके, सिद्धिः, भवति, कर्मजा।।12।।
इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली अर्थात् कर्माधार से सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।

चातुर्वण्र्यम्, मया, सृष्टम्, गुणकर्मविभागशः,
तस्य, कर्तारम्, अपि, माम्, विद्धि, अकर्तारम्, अव्ययम्।।13।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है इस प्रकार उस कर्म का कत्र्ता भी मुझ काल को ही जान तथा वह अविनाशी परमेश्वर अकत्र्ता है।
भावार्थः- गीता अध्याय 3 श्लोक 14-15 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि कर्मों को ब्रह्मोद्धवम अर्थात् ब्रह्म से उत्पन्न जान। यही प्रमाण इस अध्याय 4 श्लोक 13 में है। गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म कह रहा है कि चार वर्णों की व्यवस्था मैंने की है। इनके कर्मों का विभाजन भी मैंने किया है। वह अविनाशी पूर्ण परमात्मा इन कर्मों का अकर्ता है, ब्रह्मा रजगुण, विष्णु सतगुण तथा शिव तमगुण के विभाग भी काल ब्रह्म ने बनाए हैं सृृष्टि, स्थिती, संहार। इनका करने वाला अविनाशी परमात्मा नहीं है।

न, माम्, कर्माणि, लिम्पन्ति, न, मे, कर्मफले, स्पृृहा,
इति, माम्, यः, अभिजानाति, कर्मभिः, न, सः, बध्यते।।14।।
कर्मों के फल में मेरी स्पृृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते इस प्रकार जो मुझ काल-ब्रह्म को तत्व से जान लेता है वह भी कर्मों से नहीं बंधता अर्थात् गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहे तत्वदर्शी संत की खोज करके गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहे उस परमात्मा की शरण में जाकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है।

एवम्, ज्ञात्वा, कृृतम्, कर्म, पूर्वैः, अपि, मुमुक्षुभिः,
कुरु, कर्म, एव, तस्मात्, त्वम्, पूर्वैः, पूर्वतरम्, कृृतम्।।15।।
पूर्व काल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही शास्त्रा विधि अनुसार साधना रूपी कर्म विशेष कसक के साथ किये हैं इसलिये तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्मों को ही कर।

किम्, कर्म, किम्, अकर्म, इति, कवयः, अपि, अत्रा, मोहिताः,
तत्, ते, कर्म, प्रवक्ष्यामि, यत्, ज्ञात्वा, मोक्ष्यसे, अशुभात्।।16।।
कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस प्रकार यहाँ निर्णय करने में बुद्धिमान् साधक भी मोहित हो जाते हैं इसलिये वह कर्म-तत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा जिसे जानकर तू शास्त्रा विरुद्ध किए जाने वाले दुष्कर्मों से मुक्त हो जायगा।

कर्मणः, हि, अपि, बोद्धव्यम्, बोद्धव्यम्, च, विकर्मणः,
अकर्मणः, च, बोद्धव्यम्, गहना, कर्मणः, गतिः।।17।।
शास्त्रा विधि अनुसार कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये और शास्त्रा विधि रहित अर्थात् अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा मास-मदिरा तम्बाखु सेवन तथा चोरी - दुराचार आदि विकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है।
भावार्थ:- तत्वज्ञान को जान कर शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म से होने वाले लाभ से तथा शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म से तथा मांस, मदिरा, तम्बाखु सेवन व चोरी, दुराचार करना झूठ बोलना आदि बुरे कर्म से होने वाली हानि का ज्ञान होना अनिवार्य है। उसके लिए इस अध्याय के मंत्रा 34 में विवरण है।

कर्मणि, अकर्म, यः, पश्येत्, अकर्मणि, च, कर्म, यः,
सः, बुद्धिमान्, मनुष्येषु, सः, युक्तः, कृृत्स्न्नकर्मकृृत्।।18।।
जो मनुष्य कर्म अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना रूपी करने योग्य कर्म तथा अकर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण न करने योग्य कर्म को देखता है अर्थात् जान लेता है और जो अकर्म अर्थात् वह शास्त्रा विरुद्ध साधना न करने योग्य कर्म को नहीं करता कर्म अर्थात् करने योग्य कर्म को करता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त शास्त्रा विधि अनुसार ही कर्मों को करनेवाला है।

यस्य, सर्वे, समारम्भाः, कामसंकल्पवर्जिताः,
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्, तम्, आहुः, पण्डितम्, बुधाः।।19।।
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रा अनुकूल कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा बुरे कर्म अर्थात् शास्त्रा विधि रहित कार्य तत्व ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान होने पर साधक पूर्ण संत तलाश करके वास्तविक मंत्रा प्राप्त कर लेता है, जिससे सर्व पाप विनाश हो जाते हैं उसको शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले बुद्धिमान लोग पण्डित कहते हैं।

त्यक्त्वा, कर्मफलासंगम्, नित्यतृप्तः, निराश्रयः,
कर्मणि, अभिप्रवृत्तः, अपि, न, एव, किंचित्, करोति, सः।।20।।
तत्वज्ञान के आधार से शास्त्रा विधि रहित कर्मों में और उनके फलमें आसक्ति का सर्वथा त्याग करके शास्त्रा विधि रहित भक्ति के कर्म से रहित हो गया है और शास्त्रा अनुकूल साधना के कर्मों से नित्य तृप्त है वह संसारिक व शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्मों में भलीभाँति बरतता हुआ भी वास्तव में कुछ भी शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा तथा दोषयुक्त कर्म नहीं करता।

निराशीः, यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः,
शारीरम्, केवलम्, कर्म, कुर्वन्, न, आप्नोति, किल्बिषम्।।21।।
शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति प्राप्त आत्मा जिसने समस्त शास्त्रा विरुद्ध संग्रह की हुई साधनाओं का परित्याग कर दिया है ऐसा अविधिवत् साधना को फैंका हुआ अर्थात् शास्त्रा विधि रहित साधना त्यागा हुआ भक्त केवल हठ योग न करके शरीर से जो आसानी से होने वाली सहज साधना तथा शरीर सम्बन्धी संसारिक कर्म तथा शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्म करता हुआ क्योंकि शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा करने वालों को गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने वाले, मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते, वे केलव तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी की भक्ति करके उनसे मिलने वाली क्षणिक राहत पर आश्रित रहते हैं। इन्हीं तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी की साधना शास्त्रा विधि रहित कही है इस शास्त्रा विधि रहित साधना को त्याग कर शास्त्राविधि अनुसार भक्ति करता है। वह पाप को नहीं प्राप्त होता। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 47-48 में भी है।

यदृच्छालाभसन्तुष्टः, द्वन्द्वातीतः, विमत्सरः,
समः, सिद्धौ, असिद्धौ, च, कृत्वा, अपि, न, निबध्यते।।22।।
जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है जिसमें ईष्र्या का सर्वथा अभाव हो गया है जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है ऐसा कार्य की सिद्धि और असिद्धि में समान रहने वाला अर्थात् अविचलित कार्य करते-करते शास्त्रा अनुकूल भक्ति करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता। क्योंकि पूर्ण संत से पूर्ण मंत्रा जाप प्राप्त करने के उपरान्त निष्काम शास्त्रा अनुकूल साधना के शुभ कर्म भक्ति में सहयोगी होते हैं तथा पाप विनाश हो जाते हैं। जिससे कर्म बन्धन मुक्त हो जाता है।

गतसंगस्य, मुक्तस्य, ज्ञानावस्थितचेतसः,
यज्ञाय, आचरतः, कर्म, समग्रम्, प्रविलीयते।।23।।
शास्त्रा विरुद्ध साधना से आस्था हटने के कारण उस मुक्त हुए साधक का चित्त निरन्तर परमात्मा के तत्व ज्ञान में स्थित रहता है ऐसे केवल शास्त्रा अनुकूल भक्ति के लिये कर्म आचरण करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म प्रभु साधना के प्रति विलीन हो जाते हैं।

ब्रह्म, अर्पणम्, ब्रह्म, हविः, ब्रह्माग्नौ, ब्रह्मणा, हुतम्,
ब्रह्म, एव, तेन, गन्तव्यम्, ब्रह्मकर्मसमाधिना।।24।।
ऐसे शास्त्रा अनुकूल साधक का समर्पण भी ब्रह्म अर्थात् परमात्मा को है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी प्रभु ही है तथा पूर्ण परमात्मा के निमित्त ब्रह्मरूप अग्नि में अर्थात् प्रभु स्तुति से पापांे की आहूति हो जाती है अर्थात् पाप विनाश हो जाते हैं वास्तव में सांसारिक कार्य करते हुए भी जिसका ध्यान परमात्मा में ही लीन रहता है और जो आसानी से शरीर से होने वाले कर्म करता है अर्थात् सहज समाधी में रह कर साधना करता है उसके लिए परमात्मा प्राप्त किये जाने योग्य है अर्थात् वही परमात्मा प्राप्त कर सकता है जो सहज समाधि में रहता है।
आदरणीय गरीबदास जी महाराज भी कहते हैं:-जैसे हाली बीज धुन, पंथी से बतलावै। वा में खण्ड पड़े नहीं ऐसे ध्यान लगावै।। भावार्थ:- जैसे किसान खेत में गेहूं या अन्य फसल बीज रहा हो और कोई यात्राी आ जाए तो रस्ता पूछने पर वह किसान हल चलाते-चलाते बीज बीजते हुए यात्राी को रस्ता भी बताता है, परन्तु उसकी समाधि अपने मूल कार्य में ही रहता है। इसे सहज समाधि कहा जाता है। इसी का प्रमाण पवित्रा गीता जी कह रही है कि जो कर्मयोगी अपना कार्य करता हुआ भी प्रभु में ध्यान रखता है, वही प्रभु को प्राप्त करने योग्य भक्त है। गरीब, नाम उठत नाम बैठत नाम सोवत जाग वे। नाम खाते नाम पीते नाम सेती लाग वे।।

दैवम्, एव, अपरे, यज्ञम्, योगिनः, पर्युपासते,
ब्रह्माग्नौ, अपरे, यज्ञम्, यज्ञेन, एव, उपजुह्नति।।25।।
इसके विपरित दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परमात्मा प्राप्ति की विरह रूपी अग्नि अपने ही विचार से धार्मिक कर्मों के द्वारा ही धार्मिक कर्मों का अनुष्ठान किया करते हैं।

श्रोत्रादीनि, इन्द्रियाणि, अन्ये, संयमाग्निषु, जुह्नति,
शब्दादीन्, विषयान्, अन्ये, इन्द्रियाग्निषु, जुह्नति।।26।।
अन्य योगीजन कान नाक आदि बन्द करके अर्थात् हठ योग से समस्त इन्द्रियों को संयमरूप अग्नियों में हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न किया करते हैं और दूसरे साधक शब्द-स्र्पस आदि समस्त विषयों को इन्द्रियरूप अग्नियों में हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न किया करते हैं अर्थात् हठ करके साधना करने को मोक्ष मार्ग मानते हैं।

सर्वाणि, इन्द्रियकर्माणि, प्राणकर्माणि, च, अपरे,
आत्मसंयमयोगाग्नौ, जुह्नति, ज्ञानदीपिते।।27।।
दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की अर्थात् स्वांसों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित अपने आप को संयमयोगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं अर्थात् ज्ञान से संयम करके साधना करते हैं, इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं।

द्रव्ययज्ञाः, तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः, तथा, अपरे,
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः, च, यतयः, संशितव्रताः।।28।।
कई साधक द्रव्य-सम्बन्धी धार्मिक कर्म केवल दान करने वाले हैं कितने ही तपस्या रूप धार्मिक कर्म करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगासन रूप धार्मिक कर्म करने वाले हैं और कितने ही घोर व्रतों से युक्त यत्नशील हैं और कुछ स्वाध्याय रूप ज्ञानयज्ञ अर्थात् केवल सद्ग्रन्थों का नित्य पाठ करने वाले हैं अर्थात् इसी को मोक्ष मार्ग मानते हैं।

अपाने, जुह्नति, प्राणम्, प्राणे, अपानम्, तथा, अपरे,
प्राणापानगती, रुद्ध्वा, प्राणायामपरायणाः।।29।।
अपरे, नियताहाराः, प्राणान्, प्राणेषु, जुह्नति,
सर्वे, अपि, एते, यज्ञविदः, यज्ञक्षपितकल्मषाः।।30।।
दूसरे अपान वायु में प्राण वायु को हवन की तरह पाप जलाने का प्रयत्न करते हैं। वैसे ही प्राण वायु में अपान वायु को करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को अर्थात् स्वांसों को सूक्ष्म करके प्राणों में ही हवन की तरह जलाने का प्रयत्न किया करते हैं अर्थात् प्राणायाम करके ही प्रभु प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं। ये सभी साधक उपरोक्त धार्मिक कर्मों अर्थात् साधनाओं द्वारा पापों का नाश कर देने वाले भक्ति साधन समझते हैं अर्थात् इसी साधना को मोक्ष मार्ग मानते हैं।

यज्ञशिष्टामृृतभुजः, यान्ति, ब्रह्म, सनातनम्,
न, अयम्, लोकः, अस्ति, अयज्ञस्य, कुतः, अन्यः, कुरुसत्तम।।31।।
हे कुरुक्षेष्ठ अर्जुन! उपरोक्त शास्त्राविधि रहित साधनाओं से बचे हुए बुद्धिमान साधक शास्त्रा अनुकूल साधना से बचे हुए लाभ को उपभोग करके आदि पुरुष परमेश्वर अर्थात्-पूर्णब्रह्म को प्राप्त होते हैं और शास्त्रा विधि अनुसार पूर्ण प्रभु की भक्ति न करनेवाले पुरुष के लिये तो यह मनुष्य-लोक भी सुखदायक नहीं है फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
भावार्थ:- यज्ञ से बचे हुए अमृृत का भोग करने का अभिप्रायः है कि ‘‘पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाले साधक अपने शरीर के कमलों को खोलने वाले मन्त्रा का जाप करते हैं। वे मन्त्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्ण जी तथा श्री शिव जी व श्री दुर्गा जी के जाप भी हैं जो संसारिक सुख प्राप्त कराते हैं। इन के मन्त्रा जाप से उपरोक्त देवी व देवताओं के ऋण से मुक्ति मिलती है जो मन्त्रा जाप की ऋण उतरने के पश्चात् शेष कमाई है उस शेष जाप की कमाई से पूर्ण परमात्मा के साधक को अत्यधिक संसारिक लाभ प्राप्त होता है। इस श्लोक 31 में यही कहा है कि पूर्ण परमात्मा का साधक यज्ञ अर्थात् साधना (अनुष्ठान) से बची शेष भक्ति कमाई का उपयोग करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा के विधिवत् साधक को संसारिक सुख भी अधिक प्राप्त होता है तथा पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त होता है।
विशेष - यही प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 3 श्लोक 13 में वर्णन है तथा अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी है कि हे भारत जो साधक शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमुखी पूजा करते हैं उनको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि तथा न ही कोई गति प्राप्त होती है अर्थात् व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में अर्थात् वेदों में जो भक्ति साधना के कर्म करने का आदेश है तथा जो न करने का आदेश है वही मानना श्रेयकर है।

एवम्, बहुविधाः, यज्ञाः, वितताः, ब्रह्मणः, मुखे,
कर्मजान्, विद्धि, तान्, सर्वान्, एवम्, ज्ञात्वा, विमोक्ष्यसे।।32।।
इस प्रकार और भी बहुत तरह के शास्त्रा अनुसार धार्मिक क्रियाऐं हैं उन सबको तू कर्मों के द्वारा होने वाली यज्ञों को जान इस प्रकार पूर्ण परमात्मा के मुख कमल से पाँचवे वेद अर्थात् स्वसम वेद में विस्तारसे कहे गये हैं। जानकर पूर्ण मुक्त हो जायगा।

श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप,
सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते।।33।।
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा सम्पूर्ण शास्त्रा अनुकूल कर्म सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्व ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।

तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया,
उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्त्वदर्शिनः।।34।।
पवित्रा गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त नाना प्रकार की साधना तो मनमाना आचरण है। मेरे तक की साधना की अटकल लगाया ज्ञान है, परन्तु पूर्ण परमात्मा के पूर्ण मोक्ष मार्ग का मुझे भी ज्ञान नहीं है। उसके लिए इस मंत्रा 34 में कहा है कि उस तत्वज्ञान को समझ उन पूर्ण परमात्मा के वास्तविक ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतों को भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे पूर्ण ब्रह्म को तत्व से जानने वाले अर्थात् तत्वदर्शी ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 15-16 में भी है।

यत्, ज्ञात्वा, न, पुनः, मोहम्, एवम्, यास्यसि, पाण्डव,
येन, भूतानि, अशेषेण, द्रक्ष्यसि, आत्मनि, अथो, मयि।।35।।
जिस तत्व ज्ञान को जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान के द्वारा तू प्राणियों को पूर्ण रूप से पूर्ण परमात्मा जो आत्मा के साथ अभेद रूप में रहता है उस पूर्ण परमात्मा में और पीछे मुझे देखेगा कि मैं काल हूँ यह जान जाएगा।

अपि, चेत्, असि, पापेभ्यः, सर्वेभ्यः, पापकृत्तमः,
सर्वम्, ज्ञानप्लवेन, एव, वृजिनम्, सन्तरिष्यसि।।36।।
यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तो भी तू तत्व ज्ञान के आधार पर वास्तविक नाम रूपी नौका द्वारा सर्वस जानकर अज्ञान से पार जाकर निःसन्देह पूर्ण तरह तर जायेगा अर्थात् पाप रहित होकर पूर्ण मुक्त हो जायेगा।

यथा, एधांसि, समिद्धः, अग्निः, भस्मसात्, कुरुते, अर्जुन,
ज्ञानाग्निः, सर्वकर्माणि, भस्मसात्, कुरुते, तथा।।37।।
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है वैसे ही तत्वज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण अविधिवत् कर्मों को भस्ममय कर देता है।

न, हि, ज्ञानेन, सदृृशम्, पवित्राम्, इह, विद्यते,
तत् स्वयम्, योगसंसिद्धः, कालेन, आत्मनि, विन्दति।।38।।
इस संसार में तत्व ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं जान पड़ता उस तत्वदर्शी संत के द्वारा दिए सत भक्ति मार्ग के द्वारा जिसकी भक्ति कमाई पूर्ण हो चुकी है समय अनुसार आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले उस पूर्ण परमात्मा को गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 में वर्णित उल्लेख के आधार से अपने आप ही प्राप्त कर लेता है।

श्रद्धावान्, लभते, ज्ञानम्, तत्परः, संयतेन्द्रियः,
ज्ञानम्, लब्ध्वा, पराम्, शान्तिम्, अचिरेण, अधिगच्छति।।39।।
जितेन्द्रिय उस तत्वदर्शी संत द्वार प्राप्त साधन के साधनपरायण श्रद्धावान् मनुष्य भक्ति की उपलब्धि होने पर पूर्ण परमेश्वर के तत्व ज्ञान को प्राप्त होता है तथा तत्वज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

अज्ञः, च, अश्रद्दधानः, च, संशयात्मा, विनश्यति,
न, अयम् लोकः, अस्ति, न, परः, न, सुखम्, संशयात्मनः।।40।।
जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह विवेकहीन और श्रद्धारहित तथा संश्ययुक्त मनुष्य भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे संश्ययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक में न परलोक में सुख नहीं है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है।

योगसन्नयस्तकर्माणम्, ज्ञानसछिन्नसंशयम्,
आत्मवन्तम्, न, कर्माणि, निबध्नन्ति, धनंजय।। 41।।
हे धनंजय! जिसने तत्वज्ञान के आधार से शास्त्रा विधि रहित भक्ति के सर्व कर्मों को त्याग कर दिया और जिसने तत्वज्ञान द्वारा समस्त संश्योंका नाश कर दिया है ऐसे पूर्ण परमात्मा के शास्त्रा अनुकूल ज्ञान पर अडिग साधक को शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने से पाप कर्म होते हैं वे शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले को नहीं होते इसलिए पाप कर्म नहीं बाँधते अर्थात् वे पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं।

तस्मात्, अज्ञानसम्भूतम्, हृत्स्थम्, ज्ञानासिना, आत्मनः,
छित्त्वा, एनम्, संशयम्, योगम्, आतिष्ठ, उत्तिष्ठ, भारत।।42।।
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित अज्ञानजनित शास्त्रा विधि रहित संश्य रूपी पाप को तत्वज्ञानरूप तलवारद्वारा छेदन करके अर्थात् दूध पानी छान कर उठ अर्थात् सावधान होकर अन्तरात्मा से पूर्ण परमात्मा के शास्त्रा अनुकूल भक्ति में अडिग हो जा।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana