गीता अध्याय 03

ज्यायसी, चेत्, कर्मणः, ते, मता, बुद्धिः, जनार्दन,
तत्, किम्, कर्मणि, घोरे, माम्, नियोजयसि, केशव।।1।।
हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा तत्वदर्शी द्वारा दिया ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे एक स्थान पर बैठ कर इन्द्रियों को रोक कर, गर्दन व सिर को सीधा रख कर गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 तक वर्णित तथा युद्ध करने जैसे भयंकर तुच्छ कर्म में क्यों लगाते हैं।

व्यामिश्रेण, इव, वाक्येन, बुद्धिम्, मोहयसि, इव, मे,
तत्, एकम्, वद, निश्चित्य, येन, श्रेयः, अहम्, आप्नुयाम्।।2।।
इस प्रकार आप मिले हुए से अर्थात् दो तरफा वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।

लोके, अस्मिन्, द्विविधा, निष्ठा, पुरा, प्रोक्ता, मया, अनघ,
ज्ञानयोगेन, साङ्ख्यानाम्, कर्मयोगेन, योगिनाम्।।3।।
हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है उनमें से ज्ञानियों की निष्ठा तो ज्ञान योग अर्थात् अपनी ही सूझ-बूझ से निकाले भक्ति विधि के निष्कर्ष में और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से अर्थात् सांसारिक कार्य करते हुए साधना करने में होती है।

न, कर्मणाम्, अनारम्भात्, नैष्कम्र्यम्, पुरुषः, अश्नुते,
न, च, सóयसनात्, एव, सिद्धिम्, समधिगच्छति।।4।।
न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना शास्त्रों में वर्णित शास्त्रा अनुकुल साधना जो संसारिक कर्म करते-करते करने से पूर्ण मुक्ति होती है वह गति अर्थात् परमात्मा प्राप्त होता है जैसे किसी ने एक एकड़ गेहूँ की फसल काटनी है तो वह काटना प्रारम्भ करने से ही कटेगी। फिर काटने वाला कर्म शेष नही रहेगा और इसलिए कर्मों के केवल त्यागमात्रा से एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन पर बैठ कर संसारिक कर्म त्यागकर हठ योग से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है।

न, हि, कश्चित्, क्षणम्, अपि, जातु, तिष्ठति, अकर्मकृत्,
कार्यते, हि, अवशः, कर्म, सर्वः, प्रकृतिजैः, गुणैः।।5।।
निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्रा भी बिना कर्म किये नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु,तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिये बाध्य किया जाता है। (इसी का प्रमाण अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी है।)

कर्मेन्द्रियाणि, संयम्य, यः, आस्ते, मनसा, स्मरन्,
इन्द्रियार्थान्, विमूढात्मा, मिथ्याचारः, सः, उच्यते।।6।।
जो महामूर्ख मनुष्य समस्त कर्म इन्द्रियों को हठ पूर्वक ऊपर से रोक कर मन से उन ज्ञान इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है (इसी का विस्तृत वर्णन गीता अध्याय 17 श्लोक 19 में है।)

यः, तु, इन्द्रियाणि, मनसा, नियम्य, आरभते, अर्जुन,
कर्मेन्द्रियैः, कर्मयोगम्, असक्तः, सः, विशिष्यते।।7।।
किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से गहरी नजर गीता में इन्द्रियों को नियन्त्रिात अर्थात् वश में करके अनासक्त हुआ समस्त कर्म इन्द्रियों द्वारा शास्त्रा विधि अनुसार संसारी कार्य करते-करते भक्ति कर्म अर्थात् कर्मयोग का आचरण करता है वही श्रेष्ठ है।
विशेष:- उपरोक्त न करने वाले हठयोग को गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में करने को कहा है। इसलिए अर्जुन इसी अध्याय 3 के श्लोक 2 में कह रहा है कि आप की दोगली बातें मुझे भ्रम में डाल रही हैं।

नियतम्, कुरु, कर्म, त्वम्, कर्म, ज्यायः, हि, अकर्मणः,
शरीरयात्रा, अपि, च, ते, न, प्रसिद्धयेत्, अकर्मणः।।8।।
तू शास्त्राविहित कर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो तेरा शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण भी नहीं सिद्ध होगा।

यज्ञार्थात्, कर्मणः, अन्यत्रा, लोकः, अयम्, कर्मबन्धनः,
तदर्थम्, कर्म, कौन्तेय, मुक्तसंगः, समाचर।।9।।
यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान के निमित किये जाने वाले शास्त्रा विधि अनुसार कर्मोंसे अतिरिक्त शास्त्रा विधि त्याग कर दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही इस संसार में कर्मों से बँधता है अर्थात् चैरासी लाख योनियों में यातनाऐं सहन करता है।। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस शास्त्रानुकूल यज्ञ के निमित ही भलीभाँति भक्ति के शास्त्रा विधि अनुसार करने योग्य कर्म अर्थात् कर्तव्य कर्म संसारिक कर्म करता हुआ शास्त्रा अनुकूल अर्थात् विधिवत् साधना कर।
विशेष:- उपरोक्त गीता अध्याय 3 श्लोक 6 से 9 तक एक स्थान पर एकान्त में विशेष आसन पर बैठ कर कान-आंखें आदि बन्द करके हठ करने की मनाही की है तथा शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि अनुसार साधना करना श्रेयकर बताया है। प्रत्येक सद्ग्रन्थों में संसारिक कार्य करते-करते नाम जाप व यज्ञादि करने का भक्ति विद्यान बताया है।
प्रमाण:- पवित्रा गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में कहा है कि मुझ ब्रह्म का उच्चारण करके सुमरण करने का केवल एक मात्रा ओ3म् अक्षर है जो इसका जाप अन्तिम स्वांस तक कर्म करते-करते भी करता है वह मेरे वाली परमगति को प्राप्त होता है। फिर अध्याय 8 श्लोक 7 में कहा है कि हर समय मेरा सुमरण भी कर तथा युद्ध भी कर। इस प्रकार मेरे आदेश का पालन करते हुए अर्थात् संसारिक कर्म करते-करते साधना करता हुआ मुझे ही प्राप्त होगा। भले ही अपनी परमगति को गीता अध्याय 7 मंत्रा 18 में अति अश्रेष्ठ अर्थात् अति व्यर्थ बताया है। फिर भी भक्ति विधि यही है। फिर अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 तक विवरण दिया है कि चाहे उस परमात्मा अर्थात् पूर्णब्रह्म की भक्ति करो, जिसका विवरण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 व अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में दिया है। उसका भी यही विद्यान है कि जो साधक पूर्ण परमात्मा की साधना तत्वदर्शी संत से उपदेश प्राप्त करके नाम जाप करता हुआ तथा संसारिक कार्य करता हुआ शरीर त्याग कर जाता है वह उस परम दिव्य पुरुष अर्थात् पूर्ण परमात्मा को ही प्राप्त होता है। तत्वदर्शी संत का संकेत गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में दिया है। यही प्रमाण पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 तथा 15 में दिया है।
यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्रा 10 का भावार्थ:- पवित्रा वेदों को बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई तो कहता है कि वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है अर्थात् आकार में कहा जाता है, कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में न आने वाला अर्थात् निराकार कहता है। उस पूर्ण परमात्मा का तत्वज्ञान तो कोई धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत ही बताऐंगे कि वास्तव में पूर्ण परमात्मा का शरीर कैसा है? वह कैसे प्रकट होता है? पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी उसी धीराणाम् अर्थात् तत्वदर्शी संत से सुनों। मैं वेद ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी नहीं जानता। फिर भी अपनी भक्ति विधि को बताते हुए अध्याय 40 मंत्रा 15 में कहा है कि मेरी साधना ओ3म् नाम का जाप कर्म करते-करते कर, विशेष आस्था के साथ सुमरण कर तथा मनुष्य जीवन का मुख्य कत्र्तव्य जान कर सुमरण कर इससे मृत्यु उपरान्त अर्थात् शरीर छूटने पर मेरे वाला अमरत्व अर्थात् मेरी परमगति को प्राप्त हो जाएगा। जैसे सूक्ष्म शरीर में कुछ शक्ति आ जाती है कुछ समय तक अमर हो जाता है। जिस कारण स्वर्ग में चला जाता है। फिर जन्म-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

सहयज्ञाः, प्रजाः, सृष्टा , पुरा, उवाच, प्रजापतिः,
अनेन, प्रसविष्यध्वम्, एषः, वः, अस्तु, इष्टकामधुक्।।10।।
प्रजापति ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि अन्न द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म जिसे धर्म यज्ञ कहते हैं,जिसमें भण्डारे करना आदि है, इस यज्ञके द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और तुम को यह पूर्ण परमात्मा यज्ञ में प्रतिष्ठित इष्ट ही इच्छित भोग प्रदान करनेवाला हो।

देवान्, भावयत, अनेन, ते, देवाः, भावयन्तु, वः,
परस्परम् भावयन्तः, श्रेयः, परम्, अवाप्स्यथ।।11।।
विशेष:- गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में वर्णित उल्टा लटका हुआ संसार रूपी वृक्ष है, उस की जड़ (मूल) तो पूर्ण परमात्मा है तथा तना परब्रह्म अर्थात् अक्षर पुरुष है तथा डार क्षर पुरुष (ब्रह्म) है व तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी रूपी शाखायें हैं। वृृक्ष को मूल(जड़) से ही खुराक अर्थात् आहार प्राप्त होता है। जैसे हम आम का पौधा लगायेंगे तो मूल को सीचेंगे, जड़ से खुराक तना में जायेगी, तना से मोटी डार में, डार से शाखाओं में जायेगी, फिर उन शाखाओं को फल लगेंगे, फिर वह टहनियां अपने आप फल देंगी। इसी प्रकार पूर्णब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म रूपी मूल की पूजा अर्थात् सिंचाई करने से अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म रूपी तना में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी, फिर अक्षर पुरुष से क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म रूपी डार में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी। फिर ब्रह्म से तीनों गुण अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी,श्री शिव जी रूपी तीनों शाखाओं में संस्कार अर्थात् खुराक जायेगी। फिर इन तीनों देवताओं रूपी टहनियों को फल लगेंगे अर्थात् फिर तीनों प्रभु श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी हमें संस्कार आधार पर ही कर्म फल देते हैं। यही प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16 व 17 में भी है कि दो प्रभु इस पृथ्वी लोक में है, एक क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म, दूसरा अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म। ये दोनों प्रभु तथा इनके लोक में सर्व प्राणी तो नाशवान हैं, वास्तव में अविनाशी तथा तीनों लोकों में प्रवेश करके सर्व का धारण-पोषण करने वाला परमेश्वर परमात्मा तो उपरोक्त दोनों भगवानों से भिन्न है।
इस यज्ञ के द्वारा देवताओं अर्थात् शाखाओं को उन्नत करो और वे देवता अर्थात् शाखायें तुम लोगों को उन्नत करें अर्थात् संस्कार वश फल प्रदान करें। इस प्रकार स्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।

इष्टान् भोगान्, हि, वः, देवाः, दास्यन्ते, यज्ञभाविताः,
तैः दत्तान्, अप्रदाय, एभ्यः, यः, भुङ्क्ते, स्तेनः, एव, सः।।12।।
क्योंकि उस यज्ञों में प्रतिष्ठित इष्ट देव अर्थात् पूर्ण परमात्मा को भोग लगाने से मिलने वाले प्रतिफल रूप भोगों को तुमको यज्ञों के द्वारा फले देवता इसका प्रतिफल देते रहेगें। उनके द्वारा दिये हुए भौतिक सुख को जो इनको बिना दिये अर्थात् यज्ञ दान आदि नहीं करते स्वयं ही खा जाते हैं, वह वास्तव में चोर है।

यज्ञशिष्टाशिनः, सन्तः, मुच्यन्ते, सर्वकिल्बिषैः,
भुजते, ते, तु, अघम्, पापाः, ये, पचन्ति, आत्मकारणात्।। 13।।
यज्ञ में प्रतिष्ठित इष्ट अर्थात् पूर्ण परमात्मा को भोग लगाने के बाद बने प्रसाद को खाने वाले साधु यज्ञादि न करने से होने वाले सब पापों से बच जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिये ही अन्न पकाते हैं वे तो पाप को ही खाते हैं।

अन्नात्, भवन्ति, भूतानि, पर्जन्यात्, अन्नसम्भवः,
यज्ञात्, भवति, पर्जन्यः, यज्ञः, कर्मसमुद्भवः।।14।।
कर्म, ब्रह्मोद्भवम्, विद्धि, ब्रह्म, अक्षरसमुद्भवम्,
तस्मात्, सर्वगतम्, ब्रह्म, नित्यम्, यज्ञे, प्रतिष्ठितम्।।15।।
प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं , अन्न की उत्पत्ति वृष्टिसे होती है वृृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्म को तू ब्रह्म से उत्पन्न और ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरुष को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है अर्थात् यज्ञों का भोग लगा कर फल दाता भी वही पूर्णब्रह्म है। (इसी का प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 4 श्लोक 13 में है कि गुणों के आधार से कर्म लगाकर चार वर्ण बनाए हैं तथा कर्म का लगाने वाला कत्र्ता मैं ब्रह्म ही हूं।)

एवम्, प्रवर्तितम्, चक्रम्, न, अनुवर्तयति, इह, यः,
अघायुः, इन्द्रियारामः, मोघम्, पार्थ, सः, जीवति।।16।।
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से (प्रवर्तितम्) प्रचलित (चक्रम्) सृष्टिचक्रके (न, अनुवर्तयति) अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कत्र्तव्यका पालन नहीं करता वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करनेवाला पापी पुरुष व्यर्थ ही जीवित है।

यः, तु, आत्मरतिः, एव, स्यात्, आत्मतृप्तः, च, मानवः,
आत्मनि, एव, च, सन्तुष्टः, तस्य, कार्यम्, न, विद्यते।।17।।
परंतु जो मनुष्य वास्तव में आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा में लीन रहने वाला ही रमण और परमात्मा में ही तृप्त तथा परमात्मा में ही संतुष्ट हो, उसके लिये कोई कत्र्तव्य नहीं जान पड़ता।

न, एव, तस्य, कृृतेन, अर्थः, न, अकृृतेन, इह, कश्चन,
न, च, अस्य, सर्वभूतेषु, कश्चित्, अर्थव्यपाश्रयः।।18।।
उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचित मात्रा भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता। क्योंकि वह स्वार्थ रहित होने से किसी को शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म नहीं करवाता, न ही स्वयं करता है। वह धन उपार्जन के उद्देश्य से साधना नहीं करता या करवाता।

तस्मात्, असक्तः, सततम्, कार्यम्, कर्म, समाचर,
असक्तः, हि, आचरन्, कर्म, परम्, आप्नोति, पूरुषः।।19।।
इसलिये तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा शास्त्रा विधि अनुसार कर्तव्य कर्म को भलीभाँति करता रह। क्योंकि इच्छा से रहित होकर भक्ति कर्म करता हुआ पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

कर्मणा, एव, हि, संसिद्धिम्, आस्थिताः, जनकादयः,
लोकसंग्रहम्, एव, अपि, सम्पश्यन्, कर्तुम्, अर्हसि।।20।।
जनकादि भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिये लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू सांसारिक कार्य करते हुए भी शास्त्रा विधि अनुसार कर्म करने को ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है।

यत्, यत् आचरति, श्रेष्ठः, तत्, तत्, एव, इतरः, जनः,
सः, यत्, प्रमाणम्, कुरुते, लोकः, तत्, अनुवर्तते।।21।।
श्रेष्ठ पुरुष अर्थात् शास्त्रा विधि अनुसार साधना करने वाले साधक जो-जो आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं वह जो कुछ प्रमाण कर देता है समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।

न, मे, पार्थ, अस्ति, कर्तव्यम्, त्रिषु, लोकेषु, कि×चन,
न, अनवाप्तम्, अवाप्तव्यम्, वर्ते, एव, च, कर्मणि।।22।।
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों मे न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ।

यदि, हि, अहम्, न, वर्तेयम्, जातु, कर्मणि, अतन्द्रितः,
मम, वत्र्म, अनुवर्तन्ते, मनुष्याः, पार्थ, सर्वशः।।23।।
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाऐ क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

उत्सीदेयुः, इमे, लोकाः, न, कुर्याम्, कर्म, चेत्, अहम्,
संकरस्य, च, कर्ता, स्याम्, उपहन्याम्, इमाः, प्रजाः।।24।।
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।

सक्ताः, कर्मणि, अविद्वांसः, यथा, कुर्वन्ति, भारत,
कुर्यात्, विद्वान्, तथा, असक्तः, चिकीर्षुः, लोकसङ्ग्रहम्।।25।।
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार शास्त्राअनुकूल कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी शिष्य बनाने की इच्छा से जनता इक्कठी करना चाहता हुआ उपरोक्त शास्त्रा विधि अनुसार कर्म करे।
भावार्थ:- भगवान कह रहे है कि यदि अशिक्षित व्यक्ति शास्त्राविधि अनुसार साधना करते हैं तो शिक्षित व्यक्ति को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। इसी में विश्व कल्याण है।

न, बुद्धिभेदम्, जनयेत्, अज्ञानाम्, कर्मसंगिनाम्,
जोषयेत्, सर्वकर्माणि, विद्वान्, युक्तः, समाचरन्।।26।।
शास्त्रा अनुकूल साधकों द्वारा दिए ज्ञान से शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्मों पर अडिग अशिक्षितों अर्थात् अज्ञानियों की साधनाओं शास्त्रा विरुद्ध साधना से हानि तथा शास्त्रा विधि अनुसार साधना से लाभ होता है, इसे प्रत्यक्ष देखकर उनकी बुद्धि में अन्तर उत्पन्न न करे अर्थात् उनको विचलित न करें कि तुम अशिक्षित हो तुम क्या जानों सत्य साधना। अपने मान वश उनको भ्रमित न करके अन्य शास्त्रा विरूद्ध साधना में लीन ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह भक्ति कर्मों को सुचारू रूप से करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवा वे अर्थात् उनको भ्रमित न करके प्रोत्साहन करे।

प्रकृतेः, क्रियमाणानि, गुणैः, कर्माणि, सर्वशः,
अहंकारविमूढात्मा, कर्ता, अहम्, इति, मन्यते।।27।।
सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति दुर्गा से उत्पन्न रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी अर्थात् तीनों गुणों द्वारा संस्कार वश किये जाते हैं तो भी अहंकार युक्त शिक्षित होते हुए तत्वज्ञान हीन अज्ञानी ‘मैं कत्र्ता हूँ‘ ऐसा मानता है।

तत्त्ववित्, तु, महाबाहो, गुणकर्मविभागयोः,
गुणाः, गुणेषु, वर्तन्ते, इति, मत्वा, न, सज्जते।।28।।
परंतु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं अर्थात् जितनी शक्ति तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी में है, उससे पूर्ण परिचित व्यक्ति की आस्था इन में इतनी रह जाती है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 45-46 में भी है ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता अर्थात् अहंकार त्यागकर तुरन्त शास्त्रा अनुकूल साधना करने लग जाता है।

प्रकृृतेः, गुणसम्मूढाः, सज्जन्ते, गुणकर्मसु,
तान्, अकृत्स्न्नविदः, मन्दान्, कृत्स्न्नवित्, न, विचालयेत्।।29।।
प्रकृति से उत्पन्न प्रकृति के पुत्रा तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी से अत्यन्त मोहित हुए मुर्ख मनुष्य गुणों अर्थात् तीनों प्रभुओं की साधना के कर्मों में आसक्त रहते हैं उन पूर्णतया न समझने वाले अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर साधना करने वाले जो स्वभाव वश चल रहे हैं उन मन्दबुद्धि अशिक्षितों को सत्यभक्ति जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् शास्त्रा अनुसार साधना करने वाले मन्द बुद्धि अज्ञानियों को जो स्वभाववश तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी तक की साधना पर अडिग हैं, उनकी गलत साधना से विचलित नहीं कर सकते अर्थात् बहुत कठिन है, वे तो नष्ट ही हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक में भी है।

मयि, सर्वाणि, कर्माणि, सóयस्य, अध्यात्मचेतसा,
निराशीः, निर्ममः, भूत्वा, युध्यस्व, विगतज्वरः।।30।।
पूर्ण परमात्मा में लगे हुए चितद्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में त्याग करके आशारहित ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में है कि मेरी सर्व धार्मिक पूजाओं को मुझमें छोड़ कर सर्व शक्तिमान परमेश्वर की शरण में जा।

ये, मे, मतम्, इदम्, नित्यम्, अनुतिष्ठन्ति, मानवाः,
श्रद्धावन्तः, अनसूयन्तः, मुच्यन्ते, ते, अपि, कर्मभिः।।31।।
जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत अर्थात् सिद्धांत का सदा अनुसरण करते हैं वे भी शास्त्रा विधि त्याग कर अर्थात् सिद्धान्त छोड़ कर किए जाने वाले दोष युक्त कर्मों से बच जाते हैं।

ये, तु, एतत्, अभ्यसूयन्तः, न, अनुतिष्ठन्ति, मे, मतम्,
सर्वज्ञानविमूढान्, तान्, विद्धि, नष्टान्, अचेतसः।।32।।
परंतु जो दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत अर्थात् सिद्धान्त के अनुसार नहीं चलते हैं उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही जान।
विशेष:- गीता अध्याय 3 श्लोक 25 से 29 में अपने द्वारा बतायें गए मत अर्थात् सिद्धान्त का विस्तृृत वर्णन किया है। 3 श्लोक 25 से 29 में विचार व्यक्त किए हैं कि शिक्षित व्यक्ति यदि शास्त्रा विधि त्याग कर साधना कर रहे हैं और उन्हें कोई अशिक्षित शास्त्रा अनुसार साधना करता हुआ मिले तो उसे विचलित न करें अपितु स्वयं भी उनकी साधना को स्वीकार करे। पूर्ण सन्त से उपदेश प्राप्त करके अपना कल्याण कराऐं। यही प्रमाण गीता अध्याय 13 श्लोक 11 में भी है।

सदृशम्, चेष्टते, स्वस्याः, प्रकृतेः, ज्ञानवान्, अपि,
प्रकृतिम्, यान्ति, भूतानि, निग्रहः, किम्, करिष्यति।।33।।
सभी प्राणी प्रकृति अर्थात् स्वभाव को प्राप्त होते हैं ज्ञानवान्भी अपने निष्कर्ष द्वारा निकाले भक्ति मार्ग के आधार से स्वभाव के अनुसार चेष्टा करता है हठ क्या करेगा?
विशेष:- स्वभाव वश सर्व प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं। कहने से भी नहीं मानते। वे राक्षस स्वभाव के व्यक्ति शास्त्रा विधि रहित अर्थात् मेरे मत के विपरीत मनमाना आचरण करते हैं:- प्रमाण गीता अध्याय 16 व 17 में।
विचार करें:-- अध्याय 3 के श्लोक 33, 34, 35 का भाव है कि सर्व प्राणी प्रकृति(माया) के वश ही हैं। स्वभाववश कर्म करते हैं। ऐसे ही ज्ञानी भी अपनी आदत वश कर्म करते हैं फिर हठ क्या करेगा।
सार:- शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन हैं अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते चाहे कितना आग्रह करें, चाहे सद्ग्रन्थों के प्रमाण भी दिखा दिए जाऐं वे नहीं मानते। कुछ ज्ञानी-विद्वान पुरुष मान वश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा से सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। उन तत्वज्ञान हीन सन्तों के अशिक्षित शिष्य व शिक्षित शिष्य प्रमाण देखकर भी उन अज्ञानी सन्तों को नहीं त्यागते सत्य साधना ग्रहण नहीं करते वे मूढ़ हैं। दोनों (ज्ञानी व अज्ञानी) स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पकड़ चुका है तथा इन दोनों को समझाना व्यर्थ है। गरीब, चातुर प्राणी चोर हैं, मूढ मुग्ध हैं ठोठ। संतों के नहीं काम के, इनकूं दे गल जोट।।

इन्द्रियस्य, इन्द्रियस्य, अर्थे, रागद्वेषौ, व्यवस्थितौ,
तयोः, न, वशम्, आगच्छेत्, तौ, हि, अस्य, परिपन्थिनौ।।34।।
इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिये क्योंकि वे दोनों ही इसके विघ्न करने वाले महान् शत्राु हैं।

श्रेयान्, स्वधर्मः, विगुणः, परधर्मात्, स्वनुष्ठितात्,
स्वधर्मे, निधनम्, श्रेयः, परधर्मः, भयावहः।।35।।
गुणरहित अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर स्वयं मनमाना अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए दूसरों की धार्मिक पूजा से अपनी शास्त्रा विधि अनुसार पूजा अति उत्तम है जो शास्त्रानुकूल है अपनी पूजा में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे की पूजा भय को देनेवाली है। यही प्रमाण श्री विष्णु पुराण तृतीश अंश, अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 पृृष्ठ 215 से 220 तक है।

अथ, केन, प्रयुक्तः, अयम्, पापम्, चरति, पूरुषः,
अनिच्छन्, अपि, वाष्र्णेय, बलात्, इव, नियोजितः।।36।।
हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयम् न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए की भाँति किस से प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

कामः, एषः, क्रोधः, एषः, रजोगुणसमुद्भवः,
महाशनः, महापाप्मा, विद्धि, एनम्, इह, वैरिणम्।।37।।
रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह विषय वासना अर्थात् सैक्स और यह क्रोध जीव को अत्यधिक खाने वाला अर्थात् नष्ट करने वाला बड़ा पापी है इस उपरोक्त पाप को ही तू इस विषय में वैरी (विद्धि) जान।

धूमेन, आव्रियते, वह्निः, यथा, आदर्शः, मलेन, च,
यथा, उल्बेन, आवृतः, गर्भः, तथा, तेन, इदम्, आवृृतम्।।38।।
जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है वैसे ही उपरोक्त विकारों द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है।

आवृतम्, ज्ञानम्, एतेन, ज्ञानिनः, नित्यवैरिणा,
कामरूपेण, कौन्तेय, दुष्पूरेण, अनलेन, च।।39।।
और हे कुन्ति पुत्रा अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले कामरूप विषय वासना अर्थात् सैक्स रूपी ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।

इन्द्रियाणि, मनः, बुद्धिः, अस्य, अधिष्ठानम्, उच्यते,
एतैः, विमोहयति, एषः, ज्ञानम्, आवृत्य, देहिनम्।।40।।
इन्द्रियाँ मन और बुद्धि ये सब इस कामदेव अर्थात् सैक्स का वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम विषय वासना की इच्छा इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।

तस्मात्, त्वम्, इन्द्रियाणि, आदौ, नियम्य, भरतर्षभ,
पाप्मानम्, प्रजहि, हि, एनम्, ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।41।।
इसलिए भरतर्षभ अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान को नष्ट करने वाले महापापी काम को अवश्य ही मार।

इन्द्रियाणि, पराणि, आहुः, इन्द्रियेभ्यः, परम्, मनः,
मनसः, तु, परा, बुद्धिः, यः, बुद्धेः, परतः, तु, सः।।42।।
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं, इन इन्द्रियों से अधिक मन है, मन से तो उत्तम बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त शक्तिशाली है, वह परमात्मा सहित आत्मा है।

एवम्, बुद्धेः, परम्, बुद्ध्वा, संस्तभ्य, आत्मानम्, आत्मना,
जहि, शत्रुम्, महाबाहो, कामरूपम्, दुरासदम्।।43।।
इस प्रकार बुद्धि से अत्यन्त श्रेष्ठ परमात्मा को जानकर और अपने आप को स्वअभ्यास द्वारा संयमी हे महाबाहो! अर्जुन तू इस कामरूप अर्थात् भोग विलास रूप दुर्जय शत्रु को मार डाल।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana