गीता अध्याय 02

तम्, तथा, कृपया, आविष्टम्, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्,
विषीदन्तम्, इदम्, वाक्यम्, उवाच, मधुसूदनः।।1।।
और उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त मोह रूपी अंधकार में डूबे उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा।

कुतः, त्वा, कश्मलम्, इदम्, विषमे, समुपस्थितम्,
अनार्यजुष्टम्, अस्वग्र्यम्, अकीर्तिकरम्, अर्जुन।।2।।
हे अर्जुन! तुझे इस दुःखदाई असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि यह अश्रेष्ठ पुरुषों का चरित है न स्वर्ग को देने वाला है और अपकीर्ति को करने वाला ही है।

क्लैब्यम्, मा, स्म, गमः, पार्थ, न, एतत्, त्वयि, उपपद्यते,
क्षुद्रम् हृदयदौर्बल्यम्, त्यक्त्वा, उत्तिष्ठ, परन्तप।।3।।
हे अर्जुन! नपंुसकता को मत प्राप्त हो तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा।

कथम्, भीष्मम्, अहम्, सङ्ख्ये, द्रोणम्, च, मधुसूदन,
इषुभिः, प्रति, योत्स्यामि, पूजार्हौ, अरिसूदन।।4।।
हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लडूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं।

गुरून्, अहत्वा, हि, महानुभावान्, श्रेयः, भोक्तुम्,
भैक्ष्यम्, अपि, इह, लोके, हत्वा, अर्थकामान्, तु,
गुरून्, इह, एव, भुजीय, भोगान्, रुधिरप्रदिग्धान्,।। 5।।
महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगोंको ही तो भोगूँगा।

न, च, एतत्, विध्मः, कतरत्, नः, गरीयः, यत्, वा,
जयेम, यदि, वा, नः, जयेयुः, यान् एव, हत्वा, न,
जिजीविषामः, ते, अवस्थिताः, प्रमुखे, धार्तराष्ट्राः।।6।।
तथा यह नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध करना और न करना इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र मुकाबले में खड़े हैं।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः, पृच्छामि, त्वाम्,
धर्मसम्मूढचेताः, यत्, श्रेयः, स्यात्, निश्चितम्, ब्रूहि,
तत्, मे, शिष्यः, ते, अहम्, शाधि, माम्, त्वाम्, प्रपन्नम्।।7।।
कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्म के विषय में मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो वह मेरे लिए कहिये क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।

न, हि, प्रपश्यामि, मम, अपनुद्यात्, यत्, शोकम्, उच्छोषणम्, इन्द्रियाणाम्,
अवाप्य, भूमौ, असपत्नम्, ऋद्धम्, राज्यम्, सुराणाम्, अपि,च,आधिपत्यम्।।8।।
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक धनधान्य-सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ जो मेरी इन्द्रियों के सूखानेवाले शोक को समाप्त कर सकें।
अर्जुन कह रहा है कि भगवन यदि मुझे सारी पृथ्वी का राज्य प्राप्त हो चाहे देवताओं का भी स्वामी अर्थात् इन्द्र पद प्राप्त हो, मैं नहीं देखता हूं कि कोई मुझे युद्ध के लिए तैयार कर सकता है अर्थात् मैं युद्ध नहीं करूंगा, ऐसे कह कर चुप हो गया।

एवम्, उक्त्वा, हृषीकेशम्, गुडाकेशः, परन्तप,
न, योत्स्ये, इति, गोविन्दम्, उक्त्वा, तूष्णीम्, बभूव, ह।।9।।
हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्द भगवान्से युद्ध नहीं करूँगा यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये।

तम्, उवाच, हृषीकेशः, प्रहसन्, इव, भारत,
सेनयोः, उभयोः, मध्ये, विषीदन्तम्, इदम्, वचः।।10।।
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले।

अशोच्यान्, अन्वशोचः, त्वम्, प्रज्ञावादान्, च, भाषसे,
गतासून्, अगतासून्, च, न, अनुशोचन्ति, पण्डिताः।।11।।
तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है परंतु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते।

न, तु, एव, अहम्, जातु, न, आसम्, न, त्वम्, न, इमे, जनाधिपाः,
न, च, एव, न, भविष्यामः, सर्वे, वयम्, अतः, परम्।।12।।
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।

देहिनः, अस्मिन्, यथा, देहे, कौमारम्, यौवनम्, जरा,
तथा, देहान्तरप्राप्तिः, धीरः, तत्रा, न, मुह्यति।।13।।
जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।

मात्रास्पर्शाः, तु, कौन्तेय, शीतोष्णसुखदुःखदाः,
आगमापायिनः, अनित्याः, तान्, तितिक्षस्व, भारत।।14।।
यम्, हि, न, व्यथयन्ति, एते, पुरुषम्, पुरुषर्षभ,
समदुःखसुखम्, धीरम्, सः, अमृतत्वाय, कल्पते।।15।।
हे कुन्तीपुत्रा! सर्दी गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति विनाशशील और अनित्य हैं इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर।
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर अर्थात् तत्वदर्शी पुरुष को ये व्याकुल नहीं करते वह पूर्ण परमात्मा के आनन्द के योग्य होता है।

न, असतः, विद्यते, भावः, न, अभावः, विद्यते, सतः,
उभयोः, अपि, दृष्टः, अन्तः, तु, अनयोः, तत्त्वदर्शिभिः।।16।।
अविनाशि, तु, तत्, विद्धि, येन्, सर्वम्, इदम्, ततम्,
विनाशम्, अव्ययस्य, अस्य, न, कश्चित्, कर्तुम्, अर्हति।।17।।
असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं जानी जाती और सत्का अभाव नहीं जाना जाता इस प्रकार इन दोनों की भी तत्व, वास्तविकता को तत्वज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी संतों द्वारा देखा गया है।
नाशरहित तो तू उसको जान जिससे यह सम्पूर्ण जगत् दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

अन्तवन्तः, इमे, देहाः, नित्यस्य, उक्ताः, शरीरिणः,
अनाशिनः, अप्रमेयस्य, तस्मात्, युध्यस्व, भारत।।18।।
ये पंच भौतिक शरीर नाशवान् है अविनाशी परमात्मा जो आत्मा सहित शरीर में नित्य रहता है। साधारण साधक पूर्ण परमात्मा व आत्मा के अभेद सम्बन्ध से अपरिचित है इसलिए प्रमाण रहित को आत्मा के साथ नित्य रहने वाला अविनाशी कहा गया हैं। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! युद्ध कर।

यः, एनम्, वेत्ति, हन्तारम्, यः, च, एनम्, मन्यते, हतम्,
उभौ तौ, न, विजानीतः, न, अयम्, हन्ति, न, हन्यते।।19।।
जो इसको मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि वह वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।
भावार्थ:- पूर्ण ब्रह्म का अभेद सम्बन्ध होने से आत्मा मरती नहीं तथा पूर्ण प्रभु दयालु है वह किसी को मारता नहीं। जो कहे कि आत्मा मरती है व पूर्ण परमात्मा किसी को मारता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं।

न, जायते, म्रियते, वा, कदाचित्, न, अयम्, भूत्वा, भविता, वा, न,
भूयः, अजः, नित्यः, शाश्वतः, अयम्, पुराणः, न, हन्यते, हन्यमाने, शरीरे।।20।।
यह किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा नित्य सनातन और पुरातन है शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।

वेद, अविनाशिनम्, नित्यम्, यः, एनम्, अजम्, अव्ययम्,
कथम्, सः, पुरुषः, पार्थ, कम्, घातयति, हन्ति, कम्।।21।।
वासांसि, जीर्णानि, यथा, विहाय, नवानि, गृह्णतिः, नरः, अपराणि,
तथा, शरीराणि, विहाय, जीर्णानि, अन्यानि, संयाति, नवानि, देही।।22।।
हे पार्थ अर्जुन! जो व्यक्ति इस आत्म सहित परमात्मा को नाशरहित नित्य अजन्मा और अविनाशी जानता है वह व्यक्ति किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।

न, एनम्, छिन्दन्ति, शस्त्राणि, न, एनम्, दहति, पावकः,
न, च, एनम्, क्लेदयन्ति, आपः, न, शोषयति, मारुतः।।23।।
अच्छेद्यः, अयम्, अदाह्यः, अयम्, अक्लेद्यः, अशोष्यः, एव, च,
नित्यः, सर्वगतः, स्थाणुः, अचलः, अयम्, सनातनः।।24।।
इसे शस्त्रा नहीं काट सकते इसको आग नहीं जला सकती इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सूखा सकती।
यह अच्छेद्य है यह परमात्मा अदाह्य अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह परमात्मा नित्य सर्वव्यापी अचल स्थिर रहने वाला और सनातन है।

अव्यक्तः, अयम्, अचिन्त्यः, अयम्, अविकार्यः, अयम्, उच्यते,
तस्मात्, एवम्, विदित्वा, एनम्, न, अनुशोचितुम्, अर्हसि।।25।।
अथ, च, एनम्, नित्यजातम्, नित्यम्, वा, मन्यसे, मृतम्,
तथापि त्वम्, महाबाहो, न, एवम्, शोचितुम्, अर्हसि।।26।।
यह परमात्मा इस आत्मा के साथ गुप्त रहता है यह अचिन्त्य है और यह विकार रहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस परमात्मा को इस प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है। भावार्थ है कि जब परमात्मा जीव के साथ है तो जीव का अहित नहीं होता।
और यदि इसके बाद तू इन्हें सदा जन्मनेवाला या सदा मरने वाला मानता है तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने को योग्य नहीं है।

जातस्य, हि, ध्रुवः, मृत्युः, ध्रुवम्, जन्म, मृतस्य, च,
तस्मात्, अपरिहार्ये, अर्थे, न, त्वम्, शोचितुम्, अर्हसि।।27।।
अव्यक्तादीनि, भूतानि, व्यक्तमध्यानि, भारत,
अव्यक्तनिधनानि, एव, तत्रा, का, परिदेवना।।28।।
क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने के योग्य नहीं है।
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं केवल बीच में ही प्रकट हैं फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?

आश्चर्यवत्, पश्यति, कश्चित्, एनम्, आश्चर्यवत्,
वदति, तथा, एव, च, अन्यः, आश्चर्यवत्, च, एनम्, अन्यः,
श्रृणोति, श्रुत्वा, अपि, एनम्, वेद, न, च, एव, कश्चित्।।29।।
देही, नित्यम्, अवध्यः, अयम्, देहे, सर्वस्य, भारत,
तस्मात्, सर्वाणि, भूतानि, न, त्वम्, शोचितुम्, अर्हसि।।30।।
कोई एक ही इस परमात्मा सहित आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही आश्र्चय की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा इसे आश्र्चयकी भाँति सुनता है और कोई सुनकर भी इसको नहीं जानता।
हे अर्जुन! यह जीवाआत्मा परमात्मा के साथ सबके शरीरों में सदा ही अविनाशी है इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिये तू शोक करने को योग्य नहीं है।

स्वधर्मम्, अपि, च, अवेक्ष्य, न, विकम्पितुम्, अर्हसि,
धम्र्यात्, हि, युद्धात्, श्रेयः, अन्यत्, क्षत्रियस्य, न, विद्यते।।31।।
यदृच्छया, च, उपपन्नम्, स्वर्गद्वारम्, अपावृतम्,
सुखिनः, क्षत्रियाः, पार्थ, लभन्ते, युद्धम्, ईदृशम्।।32।।
तथा अपनी शास्त्रा अनुकूल धार्मिक पूजाओं को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं जाना जाता है।
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान्क्ष त्रिय लोग ही पाते हैं।

अथ, चेत्, त्वम्, इमम्, धम्र्यम्, सङ्ग्रामम्, न, करिष्यसि,
ततः, स्वधर्मम्, कीर्तिम्, च, हित्वा, पापम्, अवाप्स्यसि।।33।।
किंतु तू इस धार्मिकता युक्त ज्ञान के आधार से युद्ध को नहीं करेगा वही स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।

अकीर्तिम्, च, अपि, भूतानि, कथयिष्यन्ति, ते, अव्ययाम्,
सम्भावितस्य, च, अकीर्तिः, मरणात्, अतिरिच्यते।।34।।
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्तिका भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है।

भयात्, रणात्, उपरतम्, मंस्यन्ते, त्वाम्, महारथाः,
येषाम्, च, त्वम्, बहुमतः, भूत्वा, यास्यसि, लाघवम्।।35।।
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे।

अवाच्यवादान्, च, बहून्, वदिष्यन्ति, तव, अहिताः,
निन्दन्तः, तव, सामथ्र्यम्, ततः, दुःखतरम्, नु, किम्।।36।।
तेरे वैरी लोग तेरे सामथ्र्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे उससे अधिक दुःख और क्या होगा?

हतः, वा, प्राप्स्यसि, स्वर्गम्, जित्वा, वा, भोक्ष्यसे, महीम्,
तस्मात्, उत्तिष्ठ, कौन्तेय, युद्धाय, कृतनिश्चयः।।37।।
या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।

सुखदुःखे, समे, कृत्वा, लाभालाभौ, जयाजयौ,
ततः, युद्धाय, युज्यस्व, न, एवम्, पापम्, अवाप्स्यसि।।38।।
जय-पराजय लाभ-हानि और सुख-दुःख को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिये तैयार हो जा इस प्रकार पाप को नहीं प्राप्त होगा।

एषा, ते, अभिहिता, साङ्ख्ये, बुद्धिः, योगे, तु, इमाम्, श्रृणु,
बुद्धया, युक्तः, यया, पार्थ, कर्मबन्धम्, प्रहास्यसि।।39।।
हे पार्थ! यह ज्ञानवाणी तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी और अब तू इसको योग के विषय में सुन जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन को भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। ज्ञान योगियों और कर्मयोगियों से तत्वदर्शी सन्त अर्थात् योगी श्रेष्ठ है। शास्त्राविरूद्ध ज्ञान योगी अर्थात् सन्यासी तथा कर्मयोगी दोनों को ही अश्रेष्ठ कहा है।

न, इह, अभिक्रमनाशः, अस्ति, प्रत्यवायः, न, विद्यते,
स्वल्पम्, अपि, अस्य, धर्मस्य, त्रायते, महतः, भयात्।।40।।
इस योग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं जानते बल्कि इस योगरूप धर्म का थोड़ा-सा भक्ति धन भी महान् भय से रक्षा कर लेता है।

व्यवसायात्मिका, बुद्धिः, एका, इह, कुरुनन्दन,
बहुशाखाः, हि, अनन्ताः, च, बुद्धयः, अव्यवसायिनाम्।।41।।
हे अर्जुन! इस योग में निश्चयात्मिका बुद्धि व ज्ञान वाणी एक ही होती है किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ अर्थात् ज्ञान विचार धाराऐं निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती है।

याम्, इमाम्, पुष्पिताम्, वाचम्, प्रवदन्ति, अविपश्चितः,
वेदवादरताः, पार्थ, न, अन्यत्, अस्ति, इति, वादिनः।।42।।

कामात्मानः, स्वर्गपराः, जन्मकर्मफलप्रदाम्,
क्रियाविशेषबहुलाम्, भोगैश्वर्यगतिम्, प्रति।।43।।

भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्, तया, अपहृतचेतसाम्,
व्यवसायात्मिका, बुद्धिः, समाधौ, न, विधीयते।।44।।
हे अर्जुन्! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं वेद वाक्यों में ही प्रीति रखते हैं जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है दूसरी नहीं है। ऐसा कहने वाले हैं। वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित यानी दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं। जन्मरूप कर्मफल देनेवाली भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए बहुत-सी क्रियाओं को वर्णन करनेवाली है। उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है। जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा के चिन्तन में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं जान पड़ती।

त्रौगुण्यविषयाः, वेदाः, निस्त्रौगुण्यः, भव, अर्जुन,
निद्र्वन्द्वः, नित्यसत्त्वस्थः, निर्योगक्षेमः, आत्मवान्।।45।।
हे अर्जुन! तीनों गुणों अर्थात् रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण विष्णु,तमगुण शिव के भोगों के ज्ञान से तीनों गुणों से ऊपर उठ कर हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित नित्यवस्तु सत्यपुरूष अर्थात् पूर्ण परमात्मा में स्थित योग क्षेम को अर्थात् भक्ति के प्रतिफल में संसारिक सुख न चाहने वाला आत्म विश्वासी हो।

यावान्, अर्थः, उदपाने, सर्वतः, सम्प्लुतोदके,
तावान्, सर्वेषु, वेदेषु, ब्राह्मणस्य, विजानतः।।46।।
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है पूर्ण परमात्मा को तत्व से जानने वाले विद्वान का समस्त ज्ञानों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।
भावार्थ:-जिस प्रकार बहुत बड़े जलास्य (जिस का जल दस वर्ष वर्षा न होने पर भी समाप्त न हो) के प्राप्त हो जाने के पश्चात् छोटे जलास्य (जिस का जल एक वर्षा न होने पर समाप्त हो जाए) में जैसी श्रद्धा रह जाती है(छोटा जलास्य बुरा नहीं लगता परन्तु उसकी क्षमता का ज्ञान हो जाता है) इसी प्रकार तत्व ज्ञान की प्राप्ति पर अन्य ज्ञानों (चारों वेदों अठारह पुराणों व गीता जी आदि) मैं ऐसी श्रद्धा रह जाती है। क्योंकि उनमें पर्याप्त ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार तत्व ज्ञान के आधार से पूर्ण परमात्मा के गुणों का ज्ञान हो जाने पर अन्य परमात्माओं (परब्रह्म, ब्रह्म तथा श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव व दुर्गा) में ऐसी ही श्रद्धा रह जाती है। ये अन्य देवता बुरे नहीं लगते परन्तु इनसे मिलने वाला लाभ पर्याप्त नहीं है।

कर्मणि, एव, अधिकारः, ते, मा, फलेषु, कदाचन,
मा, कर्मफलहेतुः, भूः, मा, ते, संगः, अस्तु, अकर्मणि।।47।।
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न (अस्तु) हो।

योगस्थः, कुरु, कर्माणि, संगम्, त्यक्त्वा, धन×जय,
सिद्धयसिद्धयोः, समः, भूत्वा, समत्वम्, योगः, उच्यते।।48।।
हे धनजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर शास्त्रानुकूल भक्ति योग में स्थित हुआ शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्तव्य कर्मों को कर एक रूप ही योग अर्थात् वास्तविक भक्ति कहलाता है।

दूरेण, हि, अवरम्, कर्म, बुद्धियोगात्, धनजय,
बुद्धौ, शरणम्, अन्विच्छ, कृपणाः, फलहेतवः।।49।।
अपने आप निकाला भक्ति मार्ग का निष्कर्ष अर्थात् मनमाना आचरण अर्थात् अपनी बुद्धियोग से भक्ति कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिये हे धनजय! तू एक पूर्ण परमात्मा का ज्ञान देने वाले संत की शरण ढूँढ़ अर्थात् तत्वदर्शी संतों द्वारा बताया एक पूर्ण प्रभु की भक्ति साधन का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं।

बुद्धियुक्तः, जहाति, इह, उभे, सुकृतदुष्कृते,
तस्मात् योगाय, युज्यस्व, योगः, कर्मसु, कौशलम्।।50।।
समबुद्धियुक्त अर्थात् तत्वदर्शी संत द्वारा बताया वास्तविक एक रूप शास्त्रा अनुकूल भक्ति मार्ग पर लगा साधक पुरुष अच्छे कर्म जैसे मनमानी पूजाऐं जो सुकृत मान कर कर रहा था या मेरे बताए मार्ग अनुसार ओम् का जाप व यज्ञ आदि पुण्य करता था उस पुण्य को तथा बुरे कर्म जैसे मांस-मदिरा-तम्बाखु आदि नशीली वस्तुओं के सेवन रूपी दुष्कर्म पाप इन दोनों को इसी लोक में अर्थात् काल लोक में त्याग देता है अर्थात् जैसे पूर्ण संत कहता है वैसे ही करता है इसलिए तू शास्त्रा विधि अनुसार साधना अर्थात् समत्वरूप योग में लग जा यह तत्वदर्शी संत द्वारा बताया भक्ति मार्ग ही भक्ति कर्मों में कुशलता है अर्थात् बुद्धिमत्ता है।
यही प्रमाण गीता 18 श्लोक 66 में है जिसमें कहा है कि मेरी सर्व धार्मिक पूजाओं को मेरे में त्याग कर उस पूर्ण परमात्मा की शरण में जा तब मैं तुझे सर्व पापों से मुक्त कर दूंगा।

कर्मजम्, बुद्धियुक्ताः, हि, फलम्, त्यक्त्वा, मनीषिणः,
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः, पदम्, गच्छन्ति, अनामयम्।।51।।
क्योंकि तत्वज्ञान के आधार से समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्म रूपबन्धनसे पूर्ण रूप से मुक्त हो अनामी अर्थात् जन्म-मरण रोग रहित परम पद अर्थात् सतलोक को चले जाते हैं अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरण का रोग पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है।

यदा, ते, मोहकलिलम्, बुद्धिः, व्यतितरिष्यति,
तदा, गन्तासि, निर्वेदम्, श्रोतव्यस्य, श्रुतस्य, च।।52।।
जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप अर्थात् अज्ञान रूप दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी अर्थात् आपको तत्वज्ञान हो जायेगा उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक अर्थात् स्वर्ग-महास्वर्ग सम्बन्धी सभी भोगों का सुना सुनाया लोक वेद वेद विस्द्ध ज्ञान अर्थात् ज्ञानहीन वार्ता जैसा गया गुजरा महसूस होगा।

श्रुतिविप्रतिपन्ना, ते, यदा, स्थास्यति, निश्चला,
समाधौ, अचला, बुद्धिः, तदा, योगम्, अवाप्स्यसि।।53।।
भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि स्थिर होकर जब तत्व ज्ञान के आधार से एक परमात्मा के चिन्तन में स्थाई रूप से ठहर जायगी तब तू योग अर्थात् भक्ति को प्राप्त हो जायगा। तब तेरी भक्ति प्रारम्भ हो जायेगी। अर्थात् तब तू योगी बनेगा। गीता 6 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन तू योगी बन।

स्थितप्रज्ञस्य, का, भाषा, समाधिस्थस्य, केशव,
स्थितधीः, किम्, प्रभाषेत, किम्, आसीत, व्रजेत, किम्।।54।।
हे केशव! सहज समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धि पुरुष का क्या परिभाषा अर्थात् लक्षण है? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है।

प्रजहाति, यदा, कामान्, सर्वान्, पार्थ, मनोगतान्
आत्मनि, एव, आत्मना, तुष्टः, स्थितप्रज्ञः, तदा, उच्यते।।55।।
हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से अर्थात् समर्पण भाव से आत्मा के साथ अभेद रूप में रहने वाले परमात्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थाई बुद्धि वाला कहा जाता है अर्थात् फिर वह विचलित नहीं होता, केवल तत्वदर्शी संत के तत्वज्ञान पर पूर्ण रूप से आधारित रहता है। वह योगी है।

दुःखेषु, अनुद्विग्नमनाः, सुखेषु, विगतस्पृहः,
वीतरागभयक्रोधः, स्थितधीः, मुनिः, उच्यते।।56।।
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन मे उद्वेग नहीं होता सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा इच्छा रहित है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं ऐसा मुनि अर्थात् साधक स्थिर बुद्धि कहा जाता है।

यः, सर्वत्रा, अनभिस्नेहः, तत्, तत्, प्राप्य, शुभाशुभम्,
न, अभिनन्दति, न, द्वेष्टि, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।57।।
जो सर्वत्रा स्नेह रहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है। उसकी बुद्धि स्थिर है।

यदा, संहरते, च, अयम्, कूर्मः, अंगानि, इव, सर्वशः,
इन्द्रियाणि, इन्द्रियार्थेभ्यः, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।58।।
और जिस प्रकार कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर है ऐसा समझना चाहिए।

विषयाः, विनिवर्तन्ते, निराहारस्य, देहिनः,
रसवर्जम्, रसः, अपि, अस्य, परम्, दृष्टवा, निवर्तते।।59।।
इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विकार निवृत्त हो जाते हंै आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थिर बुद्धि वाले के उत्तम देखने अर्थात् विकारों से होने वाली हानि को जानने वाले के आसक्ति भी निवृत्त हो जाती है।

यततः, हि, अपि, कौन्तेय, पुरुषस्य, विपिश्चितः,
इन्द्रियाणि, प्रमाथीनि, हरन्ति, प्रसभम्, मनः।।60।।
हे अर्जुन! क्योंकि ये प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ यतन करते हुए बुद्धिमान् पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं।

तानि, सर्वाणि, संयम्य, युक्तः, आसीत, मत्परः,
वशे, हि, यस्य, इन्द्रियाणि, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।61।।
उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित हुआ शास्त्रानुसार साधना में दृढता से लगे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती है उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है अर्थात् मन व इन्द्रियों के ऊपर बुद्धि की प्रभुत्ता रहती है।

ध्यायतः, विषयान्, पंुसः, संग, तेषु, उपजायते, संगात्,
सजायते, कामः, कामात्, क्रोधः, अभिजायते।। 62।।
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

क्रोधात्, भवति, सम्मोहः, सम्मोहात्, स्मृतिविभ्रमः,
स्मृतिभ्रंशात्, बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात्, प्रणश्यति।।63।।
क्रोध से अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञान-शक्तिका नाश हो जाता है। और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।

रागद्वेषवियुक्तैः, तु, विषयान्, इन्द्रियैः, चरन्,
आत्मवश्यैः, विधेयात्मा, प्रसादम्, अधिगच्छति।।64।।
परंतु तत्व ज्ञान से अधीन किये हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई राग-द्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ भी उसमें लीन न होकर प्रसन्नता को प्राप्त होता है।

प्रसादे, सर्वदुःखानाम्, हानिः, अस्य, उपजायते,
प्रसन्नचेतसः, हि, आशु, बुद्धिः, पर्यवतिष्ठते।।65।।
अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न-चित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है।

न, अस्ति, बुद्धिः, अयुक्तस्य, न, च, अयुक्तस्य, भावना,
न, च, अभावयतः, शान्तिः, अशान्तस्य, कुतः, सुखम्।।66।।
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
भावार्थ:- जिस साधक का संश्य निवार्ण नहीं हो जाता अर्थात् जिसे तत्वदर्शी संत नहीं मिलता जिससे उसकी बुद्धि एक परमात्मा की भक्ति के स्थान पर नाना प्रकार की साधना व कामना करता रहता है, उस साधक को कोई लाभ नहीं होता।

इन्द्रियाणाम्, हि, चरताम्, यत्, मनः, अनु, विधीयते,
तत्, अस्य, हरति, प्रज्ञाम्, वायुः, नावम्, इव, अम्भसि।।67।।
क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नावको वायु हर लेती है वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के अधूरे ज्ञान पर आधारित हो जाता है जिस कारण से इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि हर ली जाती है।

तस्मात् यस्य, महाबाहो, निगृहीतानि, सर्वशः,
इन्द्रियाणि, इन्द्रियार्थेभ्यः, तस्य, प्रज्ञा, प्रतिष्ठिता।।68।।
इसलिये हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ तत्व ज्ञान के आधार से इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं उसी की बुद्धि स्थिर है।

या, निशा, सर्वभूतानाम्, तस्याम्, जागर्ति, संयमी,
यस्याम्, जाग्रति, भूतानि, सा, निशा, पश्यतः, मुनेः।।69।।
सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान् सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिये वह रात्रि के समान है।

आपूर्यमाणम्, अचलप्रतिष्ठम्, समुद्रम्, आपः, प्रविशन्ति, यद्वत्,
तद्वत्, कामाः, यम्, प्रविशन्ति, सर्वे, सः, शान्तिम्, आप्नोति, न, कामकामी।।70।।
जैसे नाना नदियों के जल जब सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है भोगों को चाहने वाला नहीं।

विहाय, कामान्, यः, सर्वान्, पुमान्, चरति, निःस्पृहः,
निर्ममः, निरहंकारः, सः, शान्तिम्, अधिगच्छति।।71।।
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता रहित अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है वही शान्ति को प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्ति को प्राप्त है।

एषा, ब्राह्मी, स्थितिः, पार्थ, न, एनाम्, प्राप्य, विमुह्यति,
स्थित्वा, अस्याम्, अन्तकाले, अपि, ब्रह्मनिर्वाणम्, ऋच्छति।।72।।
हे अर्जुन! यह इच्छाओं आदि का त्याग, अहंकार रहित उपरोक्त स्थिति (ब्राह्मी) परमात्मा को प्राप्त साधक की स्थिति है। इसको प्राप्त न होकर साधक विषयों में मोहित हो जाता है और अन्त समय में जिस साधक के विकार समाप्त नहीं हुए वह इस स्थिति में स्थित होकर भी पूर्ण परमात्मा को प्राप्त होने की क्षमता समाप्त हो जाती है अर्थात् पूर्ण परमात्मा प्राप्ति के लाभ से वंचित रह जाता है।
भावार्थ:- जो साधक पूर्ण संत से उपदेश प्राप्त करके साधना सम्पन्न नजर आता है, परंत विषय विकार त्याग नहीं करता, वह सर्व नाम प्राप्त करके भी पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाता है। गीता 2 श्लोक 70 में दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विषय में कहा गया है। इसलिए श्लोक 71 में विकार रहित साधक के विषय में कहा है तथा श्लोक 72 में विकारों में मोहित साधक के विषय में कहा है।

Srimad Bhagavad Gita - Observing the Armies - Sainya Darsana